Saturday 25 November 2023

आस्था और श्रद्धा का पर्व छठ पूजा - मणि बेन द्विवेदी



आस्था और श्रद्धा का पर्व छठ पूजा

हमारा देश भारत पर्वों और त्योहारों का देश कहलाता है।
हम अपनी प्राचीन परम्परा को अपनाने में विश्वास रखते हैं।
रीत रिवाजों से अथाह प्रेम लगाव  रहता है हर व्यक्ति को।
हमारी परम्परा हमारी ऋषियों की देन है,  हम गर्व करते हैं अपनी प्राचीन परंपरा पर।
इसी प्रकार पर्व और त्योहारों की श्रृंखला के अन्तर्गत आस्था और  सूर्य उपासना का महा पर्व छठ पूजा जो कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है।
यह पर्व पूर्वी उत्तर प्रदेश , बिहार में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।
छठ पर्व की शोभा अद्भुत होती है।बड़े ही हर्षोल्लास के साथ बड़े बुजुर्ग बच्चे पुरुष और महिलाएं इसमें शामिल होते हैं।
घर के पुरुष ही अपने सर पर (दौरा डाला)  उठा कर छठ घाट तक ले जाते हैं।
परंतु आज छठ पूजा ना केवल भारत के कोने कोने में मनाई जाती है अपितु विदेशों में भी धूमधाम से ये पर्व मनाया जा रहा है। कुछ जगह दूसरे समुदाय के लोग भी खुशी खुशी मनाते देखे गए हैं।

छठ पूजा का चार दिवसीय पर्व संतान की खुशहाली, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना के लिए किया जाता है।
यह अनुपम।व्रत सूर्योपासना का अद्भुत त्यौहार है 
यह अकेला ऐसा पर्व है जिसमें हम अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दें कर छठ माता  का पूजन करते है।
मान्यता यह भी है कि सूर्य देव की दो पत्नियां है।
उषा और प्रत्यूषा उगते सूर्य की भोर की किरण उषा है
और  सांझ की प्रत्यूषा इस प्रकार सूर्य की दोनों पत्नियों की पूजा आराधना किया जाता  हैं।
ब्रह्मा की मानस पुत्री जो षष्ठी थी इसलिए ये व्रत छठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ , इसलिए  छठी माँ का पूजन किया जाता है।

कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से प्रारंभ हो कर सप्तमी की भोर के अर्घ्य के साथ ही इस व्रत का समापन होता है।

साथ ही इस व्रत को महिलाएं और पुरुष दोनों ही करते हैं।
बड़े ही धूमधाम, नेम, साफ सफाई और श्रद्धा के साथ छठ माता का पूजन होता  है।इसलिए इसे कठिन व्रत के नाम से भी जाना जाता है।

यह व्रत श्रद्धा आस्था और प्रकृति को समर्पित है।
संतान प्राप्ति का वर सूर्यदेव से मांगते हैं वहीं जल में खड़ी व्रती स्त्रियां अपने लगन और शक्ति  का परिचय देती हैं।
भोर की लाली दिखते ही भोर का अर्घ्य  उगते हुए सूर्य देव को समर्पित किया जाता है।
बड़ा ही महत्व होता है छठ पूजा का कहते हैं कई करोड़ यज्ञों का फल एक छठ व्रत करने से मिलता है।
गीत नाद बाजे गाजे के साथ अद्भुत छंटा बिखेरती मन को मोहित करने वाला अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है घाटों पर।

छठ पूजा वर्ष में दो बार मनाया जाता है ।पहला कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी को और दूसरा चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी को।
विधि विधान दोनों का एक ही है।
परंतु तुलनात्मक रूप में कार्तिक माह के छठ को ही अधिक प्रसिद्धि मिली है।
अतः कई घरों में केवल एक ही यानी कार्तिक छठ की पूजा ही होती है।
कुछ लोग चैत्र और कार्तिक दोनों ही छठ को मनाते हैं।।


हमारे देश के  हर पर्व त्यौहार  की यह मान्यता है कि वो कहीं ना कहीं पौराणिक मान्यताओं से जुड़े हुए है।
अतः छठ के विषय में भी कुछ ऐसा ही है !
इस व्रत कि पौराणिक कथा कुछ  इस प्रकार है___


 मान्यता है कि राम के राज्याभिषेक के बाद रामराज्य की स्थापना का संकल्प ले कर राम और सीता जी ने कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी को उपवास रख कर प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य की आराधना की थी और सप्तमी को सूर्योदय के समय अपना अनुष्ठान पूर्ण करके प्रभु से रामराज्य की स्थापना का आशीर्वाद प्राप्त किया था  तभी से छठ पर्व लोकप्रिय हुआ।


चार दिवसीय अनुष्ठान से शुरू होता है ये पावन पर्व
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कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से शुरू हो कर यह पर्व कार्तिक सप्तमी को भोर का अर्घ्य दे कर  समाप्त होता है।

"नहाए खाय "

यह रस्म जब व्रती किसी पवित्र सरोवर नदी या फिर घर में ही स्नान करके व्रत का संकल्प लेती है और खाने में कद्दू लौकी की सब्जी और अरवा चावल का भात बिल्कुल पवित्रता से चूल्हे पर बना कर खाया जाता है।

 खरणा____

उसके पश्चात दूसरे दिन खरणा का रस्म होता है जिसमें व्रत करने वाली महिला सारा दिन उपवास रह कर शाम को रोटी और खीर बनाती है जिसे माँ छठ को भोग लगा कर खुद भी व्रती खाती है और सारे लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं।
खरना का खीर अद्भुत स्वाद लिए होता है मां छठ की कृपा बरसती हैं प्रसाद में।
खरना का प्रसाद अति स्वादिष्ट होता है।

उसके पश्चात तीसरे दिन निर्जला व्रत रह कर शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाता है।
और फिर पुनः भोर का अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण होता है।
इस प्रकार चार दिवसीय भव्य अनुष्ठान के साथ छठ व्रत का समापन होता है।
माँ छठ और सूर्यदेव की कृपा सभी पर बनी रहे।🙏🙏


मणि बेन द्विवेदी
वाराणसी उत्तर प्रदेश


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