Tuesday, 26 May 2026

देश - संजय वर्मा "दृष्टि"

देश - संजय वर्मा "दृष्टि"

कश्मीर से कन्याकुमारी तक,भारत को सबने संवारा है 
मिली आजादी से भारत ,अब लगता कितना प्यारा है 
बहती गंगा-जमुना सी नदियाँ ,यहाँ की पावन धारा है 
लहराता है  जब तिरंगा ,लगता कितना प्यारा है 
बलिदानियों के बलिदान से, हुआ देश आजाद हमारा है।
एक पल  को छपक गई देश भक्तो की आंसू भरी आँखे 
न्योछावर  कर दिए प्राण बलिदानियों की तस्वीर को निहारा है|.. 

आजाद होने के लिए सबने  भारत माँ को पुकारा है 
भारत मां का वंदन करके,बलिदानियों ने सब को तारा है 
खुली बेड़ियाँ बलिदानियों से, अब तो स्वतंत्रता ही सहारा है
लहराता है जब तिरंगा ,लगता कितना प्यारा है 
बलिदानियों के बलिदान से, हुआ देश आजाद हमारा है।
एक पल  को छपक गई देश भक्तो की आंसू भरी आँखे 
न्योछावर  कर दिए प्राण बलिदानियों की तस्वीर को निहारा है|... 


संजय वर्मा "दृष्टि"
मनावर जिला धार मप्र 

हौसलों से उम्मीद - संजय एम. तराणेकर

हौसलों से उम्मीद - संजय एम. तराणेकर

अंधेरों से क्यों डरना है, जब भीतर दीप जला है,
रास्ते चाहे कठिन हों, हौसलों से उन्हें सजाना है।
ये ठोकरें ही सिखाती हैं, कैसे आगे बढ़ जाना है,
गिरकर फिर उठ जाना, ये जीवन का 'तराना' है।

सपनों को मत सोने दो, उन्हें हकीकत बनाना है,
आज नहीं तो कल ही, 'मंजिल' तक तो जाना है।
हवा तेज़ हो या आँधी, दीपक फिर भी जलता है,
जो खुद पर विश्वास रखे, वही सदा 'संभलता' है।

उम्मीद की ये छोटी लौ, अंधेरा सब 'हर' जाती है,
जो कभी हार नहीं माने, वो जीत वरण करता है।
उजालों की ओर जो देखें, वहीं तो 'टिक' पाता है,
ख्वाब और ख्वाहिशे बड़ी, वही प्रेम गीत गाता है।

(स्व-रचित, मौलिक व अप्रकाशित)

संजय एम. तराणेकर,
(कवि, लेखक व समीक्षक)
 (मध्यप्रदेश)

Friday, 22 May 2026

राष्ट्र का आवाह्न - विदुषी प्रज्ञा

राष्ट्र का आवाह्न

*" जागो रे.... अब देश बचाओ वक्त का यह आवाह्न है* ,
*संकट में है देश का गौरव , संकट में स्वाभिमान है* ।

*" स्वर्ण रजत* की कांति मलिन , बाजारों में हाहाकार है ,
*ईंधन* की वेदी पर झुलस रहा , मध्यम वर्ग संसार है ,
*खाध तेल* की लपटों से, जुझ रही जन-जन की थाली है ,
*महंगाई* के इस तांडव ने, हर घर की रौनक हर डाली है ।

*सिंहासन* से गूंज रही आज, विवशता भरी पुकार है ,
*विदेशी मुद्रा* की रक्षा में , संयमित  यहीं व्यवहार है,
त्यागो तुम *परदेश की यात्रा*, देश कोष को अब  बल देना है ,
निजी सुखों की आहुति देकर , हर संकट से लोहा लेना है ।

*वर्जित हो  स्वर्ण-क्रय इस वर्ष* , यह युग का कठिन संदेश है ,
आर्थिक चक्रव्यूह के सम्मुख खड़ा , संकट में आज स्वदेश है ,
*कारपूल* और *जन परिवहन* अगर , जन-जन का हथियार बने ,
    इसी त्याग के बल पर ही *राष्ट्र* को   *आत्मनिर्भरता* की नव श्वास मिले ।

दोषारोपण का समय नहीं , यह राष्ट्र धर्म की बेला है ,
   *वैश्विक संकट* के तूफानों को अकेले भारत ने ही झेला है ,
*देश बचाओ को अब केवल नारा नहीं*, अंतर्मन का संकल्प बनाना है ,
*साधन सीमित*, *निष्ठा असीमित* इसी विकल्प से *भारत* का मान बढ़ाना है...!!

*"सिर्फ हुकूमत को कोसने से यह मंजर नहीं बदलेगा* ,
*जब तक हर शख़्स ना जागेगा , यह वतन कैसे संभालेगा* ? ?

*"जय हिन्द जय भारत"*
लेखिका - विदुषी प्रज्ञा...✍️

सोना - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

सोना - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

सोना एक धातु है, सबको अच्छा लगता है।
शुभ काम में अक्सर, सोने का जरूरत पड़ता है।
सोना पहन महिलाएं, अपनी शान दिखाती हैं।
उनके सोने का आभूषण देख, अन्य महिलाएं ललचाती हैं।
सोना की जुबान नहीं होती, 
पर बहुत कुछ कह जाता है।
सोना अगर पास हो, आत्मविश्वास बढ़ जाता है। 
कहते हैं, हर चमकती चीज सोना नहीं होती। 
सोना अगर पास हो, 
चेहरे की चमक देखने लायक होती।
सोना होता कीमती, सबके पास नहीं होता। 
सोने का प्रयोग, औषधि बनाने में भी होता।
अन्य धातु पर भी,
सोने का पॉलिश चढ़ता है।
धन और समृद्धि का प्रतीक सोना, मुसीबत में सच्चा साथी बनता है।
शुद्ध सोना खरा है होता।
पीले रंग की बहुमूल्य धातु सोना, सबकी चाहत होता।
कहते हैं, सोना आग में तप कर ही बनता है कुंदन।
हमारे वीर, जो सरहद पर लड़ते हैं, करते हम सब उनका अभिनंदन।
जब दो अच्छी चीजें एक साथ मिल जाए, सोने पर सुहागा कहलाता। 
खूबसूरती और गुण दोनों हो, 
सोने में सुगंध आ जाता।
सोने की चिड़िया कहलाया, अपना भारत देश। 
खुद पर हम गर्व करते हैं, 
जन्म लिए हम इस देश।
ईश्वर ने जो दिया है उसे संभाल कर रखो, जाते देर नहीं लगती। 
सोना मिट्टी हो जाता, देर नहीं लगती।
स्वर्ण पदक जब हमको मिलता,
खुशी का ठिकाना नहीं होता।
जिसके पास सोना नहीं है वह सोचता है, काश मेरे पास भी सोना होता।
बुरे दिनों में सोना साथ निभाता,
सच्चा साथी बन जाता है। 
आजकल सोने पर बैंक कर्ज देता, काम मनुज का चल जाता है।
सोने का महत्व है, क्योंकि यह आग में तपता है।
कठिन परिस्थिति में जो धैर्य रखता,  उसको ही लक्ष्य मिलता है।
सोने जैसा दिल रखो बंधु, औरों के दुख में काम आओ। 
हम भी किसी से कम नहीं, दुनिया को यह बतलाओ।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
स्वरचित

महंगाई की मार - गणपत लाल उदय

महंगाई की मार - गणपत लाल उदय 

विधा - कविता 

महंगाई की मार का शायद अब बज चुका है अलार्म,
विदेशी यात्रा पर रोक लगाओ अब कर दो यह कम।
सूत्रों की माने तो रोजमर्रा चींजों पर भी होगा असर,
सोना-चांदी, डीजल-पेट्रोल का उछाल देख रहें हम।।

हो सकती है बढ़ोतरी अब खाद्य-सामग्रियों के अंदर, 
ये फिजुल ख़र्चा कम करो अब घूमें नही इधर उधर।
बैंक ब्याज दर पर भी पड़ सकता है इसका ये असर,
ईरान युद्ध प्रमुख कारण है जो पार है सात समन्दर।।

ना लड़ना, ना कोई झगड़ना दिन अपने ये काट लेना,
लगेगा झटका मध्यम वर्ग को है सबका ऐसा कहना।
अब प्राकृतिक गैस मे भी आ सकता भरकम उछाल,
किराया बढ़ेगा ऑटो-टैक्सी का यह कष्ट भी सहना।।

सहना है मिलकर के सबको महंगाई वाली अब मार,
इसी का नाम है ज़िंदगी कोई इससे नही जाना हार।
चलते जाना है आशा लिए कभी तो आएगी ये बहार,
जंग तपिश से जल रहा है आज सम्पूर्ण यह संसार।। 

अर्थशास्त्रियों ने चेताया अतिशीघ्र होगा यह बदलाव, 
तले-भुने पदार्थों को कम कर बदले अपना स्वभाव।
न लेना कोई इसे हल्के में न समझे शासन का दबाव,
सारासच लिखा है हमने इस कविता में अपने भाव।।

सैनिक की कलम 

गणपत लाल उदय अजमेर राजस्थान