Monday, 27 April 2026

न्याय - डा अनन्तराम चौबे अनन्त

राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी 
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
विषय.... न्याय 
नाम.. महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर 
कविता... न्याय 

न्याय, कानून, कोर्ट, फैसला,
वकील बीच में इसके रहते है ।
अन्याय जहां जब भी होता है
न्याय पाने को कोर्ट जाते है ।

कोर्ट कचहरी और थाने में
न्याय मांगने सब जाते हैं ।
न्याय अन्याय के चक्कर में
दोनों पक्ष यहां पर जाते हैं।

न्याय अन्याय के फैसले में
कानून से फैसला होता है ।
वकील कोर्ट में जिरह करते है
गवाह और साक्ष्य रखते हैं ।

अपराधी मामले पुलिस देखती
जांच के वाद रिपोर्ट को लिखती ।
चार्ज सीट जब कोर्ट में जाती
सुनवाई केश की तब है होती ।

कानून तो बस अंधा होता है
साक्ष्य और गवाह मांगता है ।
सच को झूठ और झूठ को सच
वकीलों की जिरह से होता है ।

न्याय पाने के चक्कर में कोर्ट में
दस बीस साल गुजर जाते हैं ।
तारीख पर तारीख कोर्ट से मिलती
समय और पैसा बरवाद होते हैं ।

वकीलों की रोजी रोटी चलती है
हर पेशी में फीस जो मिलती है ।
वकीलों का काम जिरह करना है
मानवता वहां तार तार होती है ।

अपराध और दुष्कर्म के मामले में
महिलाओं की इज्जत लुटती है ।
न्याय को पाने कोर्ट जो जाता
उसकी भी इज्जत लुट जाती है ।

न्याय कानून कोर्ट के फैसले
वकीलों के माध्यम से चलते हैं ।
सारा सच न्याय मिले या न मिले
जीवन तो बर्बाद हो जाते हैं  ।

न्यायालय है न्याय का मंदिर
न्याय पता नहीं कब होता है।
किसको न्याय कब मिलता है
समय का न कुछ पता होता है ।

माध्यम वकील न्याय में होते
जो अपना धंधा करते हैं ।
सारा सच वादी, प्रतिवादी के 
पक्ष में वकील खड़े रहते हैं ।

कौन सच्चा और कौन झूठा है
पक्ष दोनों अपना रखते हैं ।
दोनों जीत का वादा करते
मन मानी फीस जो लेते हैं ।

गारंटी नहीं किसी केश की
हार जीत कब किसकी होगी ।
वकील फीस अपनी लेते हैं
अगली तारीख बढ़ा लेते हैं 

सारा सच फैसले की गारंटी नहीं 
तारीख पर तारीख ही मिलती है ।
दस बीस साल केश चलते हैं
खर्च की कोई सीमा नहीं होती है ।

सरकार यूजीसी कानून बनाया 
सवर्ण बच्चों पर अन्याय किया है ।
देश में यूजीसी का विरोध हो रहा है 
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाया है ।

न्याय कब होगा पता नहीं है
तारीख पर तारीख बढ़ा रही है ।
आरक्षण एस सी एस टी एक्ट 
यूजीसी कानून से मुसीबत बढ़ रही है ।

   महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
    जबलपुर म प्र/

शांति - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

शांति - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 

वह इंसान बहुत भाग्यशाली है,
जिसके जीवन में शांति है। 
वरना आजकल तो चारों ओर, दिखती केवल अशांति है।
शांति पाने के लिए,
हम जीवन भर मेहनत करते हैं।
पर अधिकांश लोग जीवन भर, शांति से दूर ही रहते हैं।
आज देश में अधिकांश जगह, अशांति ही दिखती है। 
विद्रोह की बातें, हमें ज्यादा सुनने को मिलती हैं।
अशांति कभी अच्छी नहीं होती,  चाहे घर हो, परिवार, देश या संसार।
हम अपने कर्तव्य पर कम ध्यान देते हैं, 
मांगते हैं तो केवल अपना अधिकार।
शांति हमें प्यारी होती, 
पर हमारे पास यह नहीं टिकती।
शांति के लिए हमें ही प्रयास करना होगा, यह बाजार में नहीं बिकती।
मतभेद हो सकता है, उसको देना नहीं तूल।
सबसे प्यार से बातें करना, उनकी गलती जाना भूल।
शांति से अपनी बात कहना, 
शांति से औरों की सुनना।
अशांत वातावरण में, 
अपने पैर क्यों रखना?
मन की शांति के लिए, स्वस्थ तन होगा रखना।
'ढाक के तीन पात' बने रहने से अच्छा है, खुद को बदलना।
विश्व शांति दिवस 21 सितंबर को मनाया जाता है। 
शांति जीवन में हो, मानव आगे बढ़ता जाता है।
सफेद कबूतर को, शांति का प्रतीक माना जाता है। 
शांत मन ऊर्जा से भरा रहता,  यही बताया जाता है।
मन यदि शांत हो, हम निर्णय ले पाते हैं सही। 
मन यदि अशांत हो, किसी
कार्य में मन लगता नहीं।
हम भारतवासी, 'जियो और जीने दो' में विश्वास करते हैं। 
भारत एक शांतिप्रिय देश है, ऐसा संसार के लोग कहते हैं।
शांति के लिए यदि थोड़ा झुकना पड़े, झुक जाना जरूर।
ऐसा अहंकार किस काम का, जो तुमको अपनों से ही कर दे दूर।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' स्वरचित

डॉ पी सी कौंडल - डॉ पी सी कौंडल

                                                    डॉ पी सी कौंडल - डॉ पी सी कौंडल

       महिला का न केवल भारत बल्कि समूचे विश्व भर में विशेष स्थान रहा है। महिला मां है, बहन है, बेटी है, पत्नी है। क्या महिला के बिना मानव संसार की कल्पना की जा सकती है? महिला के बिना मानव रचना असम्भव है। महिला ही बच्चे को जन्म दे सकती है। वह बच्चे को जन्म ही नहीं देती,अपितु उसका पालन पोषण भी करती है और अपनी सारी ममता उस बच्चे पर न्योछावर कर देती है। बच्चा भले ही बेटा हो या बेटी, वह तो महिला(मां)  के कलेजे का टुकड़ा होता है। बच्चों की देख रेख के अतिरिक्त महिला अपने पति, सास ससुर की सेवा भी करती है और अपने माता पिता की देख रेख भी करती है। महिला का घर गृहस्थी और समाज में बहुत बड़ा योगदान रहता है। घर का सारा काम काज वह स्वयं करती है। घर में आए मेहमानों के मान सम्मान में भी वह कोई कमी नहीं छोड़ती।  फिर महिला को पुरुषों से कम क्यों आंका जाता है? आज महिला पुरुषों से बहुत आगे निकल चुकी है 
इतिहास साक्षी है;
       अति बहादुर रही झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, देश की राष्ट्रपति रही श्रीमती प्रतिभा पाटिल जी, प्रधानमंत्री रही श्रीमती इंदिरा गांधी जी, नेशनल कांग्रेस पार्टी चीफ रही श्रीमती सोनिया गांधी जी, लोकसभा अध्यक्ष रही श्रीमती मीरा कुमार जी तथा केंद्रीय मंत्रिमंडल, राज्य सभा, विधान सभाओं में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर आसीन रहीं अनेक महिलाओं के नाम उल्लेखनीय हैं, फिर महिला को समाज के हर क्षेत्र में पुरुषों के समान अधिकार क्यों नहीं दिए जाते? उसे कमजोर क्यों समझा जाता है? 
         मेरे विचार से हर क्षेत्र में महिला को पचास प्रतिशत की हकदारी के अधिकार प्राप्त होने ही चाहिए। जमीन जायदाद में भी पुरुष के नाम के साथ महिला( पत्नी) का नाम भी अवश्य जुड़ना चाहिए ताकि पुरुष( पति) और महिला( पत्नी) दोनों एक दूसरे के पूरक बन पाएं। महिला के बिना पुरुष अधूरा है और पुरुष के बिना महिला भी अधूरी है। एक दूसरे के बिना दोनों का कोई अस्तित्व नहीं है 
      युगों युगों से महिला इस पुरुष प्रधान समाज में अनेकों प्रकार के दुःख झेलती चली आ रही है। उसे पुरुषों के समान पूरे अधिकार देने होंगे ताकि एक स्वस्थ और खुशहाल समाज की परिकल्पना की जा सके।

डॉ पी सी कौंडल, हिमाचल प्रदेश

महिला आरक्षण बिल - Dr. Pro. Y. Kasturi Bai

महिला आरक्षण बिल - Dr. Pro. Y. Kasturi Bai 
महिला आरक्षण बिल
सिर्फ कागज़ की स्याही नहीं,
यह वर्षों की चुप्पी का उत्तर है—
जब संसद के गलियारों में
आवाज़ें थीं, पर आधी अधूरी।

समानता का अर्थ
सिर्फ बराबरी का शब्द नहीं,
यह उस बेटी की मुस्कान है
जो स्कूल से लौटकर कहती है—
“माँ, अब मैं भी नेता बन सकती हूँ,”
और उसकी आँखों में
नए सपनों का उजाला जगता है।

न्याय तब होता है
जब रसोई और संसद के बीच
दीवारें गिरती हैं,
और भागीदारी तब जन्म लेती है
जब हाथ सिर्फ चूल्हे तक सीमित नहीं रहते,
बल्कि निर्णयों की मेज तक पहुँचते हैं।

अधिकार कोई दान नहीं,
यह जन्मसिद्ध धड़कन है—
जैसे खेत में काम करती वह स्त्री
जिसने कभी अपना नाम वोटर सूची में नहीं देखा,
अब अपनी पहचान खुद लिखती है,
और अपने बच्चों को
समान भविष्य का सपना दिखाती है।

विकास का चेहरा तब सुंदर होता है
जब उसमें हर रंग शामिल हो,
जब पंचायत की चौपाल से लेकर
संसद के ऊँचे मंच तक
महिलाओं की उपस्थिति
सिर्फ संख्या नहीं, शक्ति बनती है।

यह आरक्षण
कमज़ोरी की बैसाखी नहीं,
बल्कि अवसर का द्वार है—
जहाँ अनुभवहीन हाथ भी
नए इतिहास गढ़ सकते हैं,
और समाज को नई दिशा दे सकते हैं।

और तब समाज स्वस्थ होगा,
जब सम्मान किसी एक का विशेषाधिकार नहीं,
बल्कि हर स्त्री की स्वाभाविक पहचान होगा—
जहाँ वह सिर उठाकर कह सके,
“मैं भी इस देश की दिशा हूँ।”
Dr. Pro.  Y. Kasturi Bai 
Bengaluru 
Karnataka

तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें - रशीद अकेला


तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें - रशीद अकेला 

तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें …..दूँगा*

शिक्षा स्वास्थ्य  हर क्षेत्र में व्यापारी दूँगा 
तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें बेरोजगारी दूँगा

लड़ रहे बरसों से अत्याचार भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़
तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें भ्रष्टाचारी दूँगा 

सत्ता के गुणगान में भौंकेगी मीडिया
तुम मुझे वोट दो मैं उन्हें दलाली दूँगा

सबके लोन माफ किसान देश के जवान साफ़ 
तुम मुझे वोट दो  मैं तुम्हें ऐसी खुशहाली दूँगा

अनपढ़ ज़ाहिल गँवार अंधभक्त देश का मुक़द्दर 
तुम मुझे वोट मैं तुम्हें शासन में दुराचारी दूँगा

सब खाके सबको खाके भी ना मारे ढकार 
तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें राष्ट्रीय भिखारी दूँगा 

द्रोपदी क्या बचाएगी अपनी इज़्ज़त रशीद
तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें बलात्कारी दूँगा

रशीद अकेला , झारखंड 
लेखक एवं समाजसेवी