Tuesday, 21 April 2026

बर्बादी - सपना

 
 बर्बादी - सपना 

बर्बादी यूँ ही नहीं उतरती जीवन में,
यह धीरे-धीरे पनपती है,
चुपके से दिल में घर करती है,
और फिर सब कुछ अपना सा लगता है उसे।

कभी यह सपनों की राख बनकर आती है,
तो कभी उम्मीदों की लौ बुझा जाती है,
चेहरे पर मुस्कान रहती है,
पर भीतर से इंसान टूट जाता है।

बर्बादी सिर्फ खोने का नाम नहीं,
यह खुद को भूल जाने की कहानी है,
जहाँ इंसान आईने में खुद को ढूँढता है,
पर पहचान कहीं खो चुकी होती है।

रिश्ते भी तब पराये लगने लगते हैं,
जब विश्वास की डोर कमजोर हो जाए,
और शब्दों की गर्माहट भी,
दिल के ठंडेपन को पिघला न पाए।

पर हर बर्बादी के बाद एक सवेरा भी होता है,
जो सिखाता है फिर से जीना,
राख से उठकर फिर खड़ा होना,
और खुद को फिर से पाना।

बर्बादी अंत नहीं है जीवन का,
यह एक कठिन मोड़ भर है,
जो संभल गया वो जीत गया,
वरना यही मोड़ सबसे बड़ा सबक है। 


परिचय
नाम - सपना 

युद्ध - डॉ निर्मल सूद

युद्ध - डॉ निर्मल सूद
 
सुना आपने हवाओं को?
मैंने सुनी उनकी सिसकियाँ
सुबकती हवाओं का रूदन
उनके स्पर्श का गीलापन
आँसुओं से भीगी-भीगी 
कहाँ से आई हो तुम ?
युद्ध भूमि से जहाँ हो रहा नरसंहार..।
जहाँ मिट्टी में इन्सानी लहू मिला है,
बच्चों का क्रंदन, पुरुषों की चीत्कार,
औरतों की पीड़ा सनी चीखें
अनायास सब कुछ बदल गया
 जीवन भर का संग्रह पूँजी,
 घर, रिश्ते,सपने सब लूट गया
रह गये सिर्फ़ घाव उनसे बहता 
दर्द का रिसाव,
कितना हिंसक है मनुष्य ताक़त
शासन, सत्ता , दौलत की हवस
छीन लेती है इन्सानियत,
ह्रदयहीन पत्थर सा मनोवेगों
संवेदनाओं से विहीन निष्ठुर
ओह! कितना वीभत्स घिनौना 
भयावह , अपने और अपनों 
के प्राण बचा कर अन्धाधुँध
भागते लोग , गोलियाँ बारूद
धुँआ-धुँआ शहर , छूटते हाथ
अपनों का साथ दिल दहलाता
 मंजर ….
 साहसी निडर योद्धा पुरूष
औरतें हथियार उठा सिर मुँह
बाँध अपने वतन और अपनों के
जीवन के लिए जंग लड़ते, 
मरते, मिटते लोग 
सत्ता के मोहरे जो बिछे हैं
युद्ध की बिसात पर,
 अपनी रूह और जिस्म की
सिलवटों को सहेजती औरतें
परिवार के अवशेष बटोरती
बदहवास,
कौन है सूत्रधार इनके जीवन का
दोनों पक्षों के सत्ताधारियों का
विध्वंसक खेल
इतना विनाश महाकाल का तांडव ,हाहाकार,
चारों तरफ बिखरे मानव अंग
कटी भुजाएं कबंध,
मानवता का इतना ह्रास.. विनाश
यह सब देख कर भी नहीं होती
शमित प्यास,
शासकों की “मैं “की तुष्टि का यह परिणाम ,
फिर भी कहाँ पसीजते इनके पाषाण हृदय,
लोग इनके लिए सिर्फ़ गणना मात्र से न इतर,
काश युद्ध की विभीषिका का ताप पहुँचे इन तक,
नहीं होते युद्ध के परिणाम श्रेयस्कर ….
 फिर से अमन-प्रेम के फूल खिलें,
जो बिछुड़े हैं ज़लज़ले में नियति से फिर मिलें,
ए हवाओ!सुनो तुम ले जाओ
हमारा संदेश,
कहना हम भी हैं साथ तुम्हारे 
फ़िज़ा में जंहा आज बिखरा है
ग़म उदासी ,
कल ख़ुशियों की बहारें होंगी
सबके अपने घर होंगे छत पर
परिंदों की क़तारें होंगी,
टूटे घरों की दरारों व घायल मन 
के बीच पुनः आस हरी होगी
ले जाओ मेरा स्नेहिल स्पर्श 
उनके घावों को हल्के से छू लेना,
तुम भी बहना संभल कर ज़रा
हो सके जितना उन्हे सुकून देना।

    डॉ निर्मल सूद
चण्डीगढ़ 

युद्ध विकल्प कैसे हो सकता है - डाँ० योगेश सिंह धाकरे "चातक"

युद्ध विकल्प कैसे हो सकता है - डाँ० योगेश सिंह धाकरे "चातक" 

इन नेताओं की 'महत्वाकांक्षा' और 'जिद' शायद मानवीय संवेदनाओं से बड़ी हो चुकी है। 

!! "युद्ध विकल्प कैसे हो सकता है" !!
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वसुधा' धन धान्य दाता के रूप मैं ।
मानव के भाग्य विधाता के रूप मैं ।
धरा" धरती" मेदिनी, नाम हैं इसके,
सभी निवासी, बेटे समान हैं इसके ।

वसुधा भगवान ने दी है, रहने के लिये,
ना कि वर्चस्व की आग मे जलने के लिये ।
वसुधा पर खिची तमाम सरहदें बेमानी है,
जब दिलो मे जगह ओर आँखो मे पानी है ।

मानव ही दानव बन इसे उजाड़ने मे लगा है ।
धरा का धैर्य टूटा तो मानव होना ही सजा है ।

मत लो परीक्षा, ईश्वर के साथ प्रकृति की ।
कर लो रे सम्मान, धैर्य धारिता पृथ्वी की ।

युद्ध विकल्प क्यों हो गया है..समस्या का ।
क्या र्निबल को अधिकार नही है,रक्षा का ।

युद्ध की परिणीती तो,भयावह होती है ।
वही तो, कुरुक्षेत्र का कथानक होती है ।

युद्ध आज तक कोई जीता है
एकमात्र जनता ही हारती है ।
सब कुछ लुटा करके बेचारी,
लाशें भी नही समेंट पाती है ।।

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स्वरचित.......
डाँ० योगेश सिंह धाकरे "चातक"
{ ओज कवि } आलीराजपुर म.प्र

धोखा - डा अनन्तराम चौबे अनन्त


                                                     राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी की 

साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु
विषय...  धोखा
नाम.. महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर म प्र
कविता...धोखा 

झूठ, फरेब, धोखा करना 
इसका  ही बोलबाला है ।
सच्चाई का नही जमाना
ये कैसा समय निराला है ।

सच की राह पर जो चलता है 
दर दर की ठोकरें वो खाता है ।
जीत अंत में सच्चाई की होती
मुश्किल भरा जीवन होता है ।

सभी सरकारी आफिसों हैं
बस भ्रष्टाचार फैला हुआ है ।
छोटा बड़ा कोई भी काम हो
भ्रष्टाचार का जाल बिछा है ।

झूठे फरेबी धोखेबाज लोग 
सभी काम धोखा से करते हैं ।
लोगों से लाखों रुपया लेकर
शहर छोड़कर भाग जाते हैं ।

अपना स्वार्थ सिद्धि करने में
हर ऐसा इन्सान लगा हुआ है ।
झूठ का बोलबाला रहता है
मन में फितूर ऐसा भरा हुआ है ।

सारा सच धोखा देकर ही 
बच्चों का अपहरण करते हैं ।
माता पिता से फिरौती की
रकम मांगते झूठ बोलते हैं ।

कुछ बेटे बहू ऐसे भी हैं
माता पिता को धोखा देते हैं ।
घर जमीन अपने नाम लिखाकर
माता पिता को वृद्धाश्रम छोड़ देते हैं।

झूठ फरेब और मक्कारी है
सारा सच झूठ का बोलबाला है ।
इन्सान के मन में धोखा बसा है
पर दिखने में भोला भाला है ।

सच और झूठ की दो राहें हैं
सच की राह सफल बनाती है ।
सच की राह  कठिन होती है
कदम कदम पर ठोकर लगती है ।

झूठ फरेब धोखेबाज हमेशा
ऐशो आराम से ही रहते हैं ।
लोगों को उल्लू बनाकर ही
हरदम फलते फूलते रहते हैं ।

अदालत कोर्ट कानून जहां है
सारा सच झूठ के आदेश वही हैं ।
गुनाहगार बेगुनाही के फैसले
अक्सर ही  रोज वहीं होते है ।

जज के सामने बाबू बैठकर
पेशी वालों से रुपया लेते रहते है।
ऐसे भ्रष्टाचार और धोखे को
क्या जज देख नही पाते हैं ।

वर्तमान में परिवेश में न्याय की
दिशा दशा दोनों ही खराब हैं ।
न्याय के नाम पर लड़ो लड़ाई
न्याय का मिलना एक ख्वाब है ।

कोर्ट कचहरी और अदालत
कानून के ही ये रखवाले हैं ।
बेगुनाह और गुनाहगारों के
सच झूठ के होते फैसले हैं ।

कौन सच्चा और कौन झूठा है
अदालत कोर्ट ही तय करते हैं ।
अंधे कानून के मायाजाल में
सच और झूठ के फैसले होते हैं ।

गुनाहगार बेगुनाह गारों के फैसले
अदालत कोर्ट के आदेश से होते हैं ।
गवाहों और वकीलों की दलीलें से
सारा सच क्या है पर आदेश होते हैं ।

कोर्ट कचहरी अदालतों में बस
न्याय को पाने की मुश्किल होती है ।
वकीलों की महंगी फीस होती है
कोर्ट से तारीख पर तारीख मिलती है।

कोर्ट का सच झूठ कोर्ट ही जाने
सारा सच क्या है समझ न आये ।
बेगुनाह और गुनाहगारों के कोर्ट 
के आदेश पर अंगुली कौन उठाये ।

सारा सच कोर्ट कचहरी कानून 
 से देश में  सभी दुखी रहते हैं ।
न्याय पाने की उम्मीद से ही
मजबूरी में अदालत जाते हैं ।

न्याय अन्याय तो कोर्ट ही जाने
पर प्रश्न खड़े तो होते ही हैं ।
निर्णय के खिलाफ कौन बोले
विरोध करने से सभी डरते हैं ।

महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
   जबलपुर म प्र

विश्वयुद्ध - डॉ पी सी कौंडल

 

विश्वयुद्ध - डॉ पी सी कौंडल

विश्वयुद्ध का खतरा सिर पर मंडरा रहा
ईरान इजरायल में छिड़ा युद्ध ये सब बटला रहा।

अमेरिका ईरान को बार बार धमका रहा
रोनाल्ड ट्रंप विश्व में अपना नाम चमका रहा।

उधर रशिया भी अपनी टांग अड़ा रहा 
महीनों से चला यह युद्ध खत्म होने में नहीं आ रहा।

गोलियां, मिसाइलें दागने से ईरान बाज नहीं आ रहा।
भारत दोनों देशों को शान्ति का पाठ पढ़ा रहा।

विश्वयुद्ध के नाम से सब देशों को भरमा रहा
जेट विमानों के जरिए गोलियां बरसा रहा।

कभी भारत पाकिस्तान में कड़वापन आ रहा 
कभी चीन भी बड़ी बड़ी आँखें दिखा रहा।

रात दिन ये महायुद्ध चलता ही जा रहा 
रातों को भी खून की नदियां बहा रहा।

माताओं,बहनों,बच्चों का अकारण खून बहता जा रहा।
इन हालातों को देख विश्वयुद्ध नजदीक आ रहा।

विश्वयुद्ध अगर हुआ तो दुनियां का नामोनिशान मिट जाएगा 
तब संपूर्ण ब्रह्मांड में अंधकार छा जाएगा।

लगता नहीं दोनों देशों के बीच शीशफायर हो पाएगा
शीशफायर अगर हो गया तो अमन चैन हो जाएगा।

डॉ पी सी कौंडल, वरिष्ठ साहित्यकार, हिमाचल प्रदेश,