Tuesday, 14 July 2026

सेवा : मानवता का सर्वोच्च धर्म - उजमा तरनुमा

 


सेवा : मानवता का सर्वोच्च धर्म - उजमा तरनुमा

सेवा मानव जीवन का एक महान गुण है। यह केवल किसी की सहायता करने का कार्य नहीं, बल्कि मानवता के प्रति हमारी संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का प्रतीक है। सेवा का भाव व्यक्ति को स्वार्थ से ऊपर उठाकर समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए प्रेरित करता है।

हमारे भारतीय संस्कारों में सेवा को सर्वोच्च धर्म माना गया है। माता-पिता की सेवा, गुरुजनों का सम्मान, रोगियों की सहायता तथा जरूरतमंदों की मदद करना सेवा के ही विभिन्न रूप हैं। सेवा के लिए धन का होना आवश्यक नहीं है। मधुर वचन, सहानुभूति, समय और श्रम का योगदान भी सेवा का महत्वपूर्ण रूप है।

आज के व्यस्त और प्रतिस्पर्धी युग में लोगों के पास एक-दूसरे के लिए समय कम होता जा रहा है। ऐसे समय में सेवा का महत्व और भी बढ़ जाता है। किसी भूखे को भोजन देना, वृद्ध व्यक्ति को सड़क पार कराने में मदद करना, रक्तदान करना, पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण करना तथा शिक्षा से वंचित बच्चों को पढ़ाना समाज सेवा के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

सेवा का लाभ केवल समाज को ही नहीं मिलता, बल्कि सेवा करने वाले व्यक्ति को भी आत्मिक संतोष और मानसिक शांति प्राप्त होती है। सेवा मनुष्य के भीतर करुणा, दया और प्रेम जैसे गुणों का विकास करती है। यही गुण एक आदर्श समाज की नींव रखते हैं।

अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में सेवा के भाव को अपनाना चाहिए। यदि हम सभी अपनी क्षमता के अनुसार दूसरों की सहायता करें, तो समाज में सुख, शांति और सद्भाव का वातावरण स्थापित हो सकता है। वास्तव में, निःस्वार्थ सेवा ही मानव जीवन को सार्थक और महान बनाती है।

Uzma Taranum 

Karnataka 

दान - अनीता चमोली "अनू"

 

दान - अनीता चमोली "अनू"
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मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे मे देते है सब दान।
खंबो पर अपना नाम लिखाकर बन जाते है छोटे भी महान।
लेकिन जो है दिल के बडे उनको है सच्चा ज्ञान। 
रोटी कपडा और औषधि से  बडा न कोई दान।
पैसे मत दो मंदिर मस्जिद ईश्वर ने दिये दो हाथ।
थोडा समय का दान मिलाकर करो नयी शुरुआत।
गरीब बच्चों को पढा लिखा कर उनका जीवन सवांर दो।
गरीब बिटियो की शादी मे पहुंच कर  आशीर्वाद और प्यार दो।
वन्य जीवों पर दया करो तुम उनको जीवन दान दो।
धरती को रखो हरा भरा अर प्रकृति को सौन्दर्य दान दो।
दान नही जो धन से होता लूट उसकी हो जाती है।
चोर लूटेरे भरे पडे है हकदार को कब रोटी मिल पाती है।
नही मुझे सम्मान की लालसा नही मेरा कोई नाम हो।
इतनी सी है इच्छा मेरी इन हाथो से कर्म सारे मेरे निष्काम हो।

       अनीता चमोली "अनू"
        उत्तराखंड
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दान का धर्म - डॉ. वै. कस्तूरी बाई

 


दान का धर्म - डॉ. वै. कस्तूरी बाई 

चंदा यदि छल की चादर ओढ़े, तो वह धर्म नहीं, व्यापार बने,
 योगदान तभी पावन होता, जब निस्वार्थ भाव का द्वार खुले।
मदद वही, जो मौन करुणा बन, पीड़ित के आँसू पी जाए,
 भेंट वही, जो अहंकार त्यागकर, मानवता के चरण चढ़ जाए।
सेवा केवल कर्म नहीं है, यह जीवन का दिव्य विधान,
 जहाँ परहित ही परम आराध्य, वहीं बसता सच्चा भगवान।
पुण्य कभी सिक्कों से नहीं, निर्मल अंतःकरण से मिलता है,
 जो भूखे के अधरों पर मुस्कान धर दे, वही अमृतफल खिलता है।
पर जहाँ चोरी विश्वास चुराए, और घोटाला जनधन हर ले,
 वहाँ सभ्यता की आँखें रोतीं, न्याय स्वयं भी मौन ठहर ले।
धन का वैभव क्षणभंगुर होता, चरित्र सदा अमर कहलाता,
 लोभ की ज्वाला अंततः मानव का ही अस्तित्व जलाती जाती।
सहयोग वह दीपक है, जो अनेक हृदयों को आलोकित करता है,
 एकता का प्रत्येक संकल्प राष्ट्र का भाग्य प्रकाशित करता है।
दान न केवल वस्तु का अर्पण, अपितु मन का पावन विस्तार है,
 जहाँ समर्पण की गंगा बहती, वहीं सच्चा जीवन साकार है।
आओ ऐसा युग फिर रचें, जहाँ सत्य ही सर्वोच्च प्रमाण बने,
 न छल, न प्रपंच, न लोभ का विष, केवल मानवता का गान बने।
करुणा हो पूँजी, सेवा हो साधना, सहयोग हमारा सम्मान बने,
 और प्रत्येक दान, प्रत्येक योगदान, भारत की उज्ज्वल पहचान बने।

डॉ. वै. कस्तूरी बाई 
कर्नाटक

दान की ओट - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा"

 


दान की ओट - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा"

चंदे की थाली लेकर जब,

कुछ चेहरे मुस्काते हैं,

सेवा के मीठे नारों से,

सपनों को बहलाते हैं।

दान समझकर जो सौंपा था,

वह विश्वास का अंश था,

पर चोरी की काली छाया में,

टूट गया हर हर्ष था।

योगदान था जनता का,

आशा की हर साँस थी,

घोटालों की आग लगी तो,

जल उठी हर आस थी।

भेंट अगर ईमान की हो,

तो मंदिर भी मुस्काता है,

पुण्य तभी फलता जग में,

जब मन निर्मल हो जाता है।

सेवा का अर्थ दिखावा नहीं,

न सत्ता का व्यापार बने,

मानवता की हर धड़कन में,

करुणा का संसार बने।

आओ ऐसा युग रचें,

जहाँ विश्वास न बिक पाए,

चंदा पहुँचे ज़रूरतमंद तक,

कोई अधिकार न लुट पाए।

दान नहीं है धन का केवल,

मन का उजला व्यवहार है,

सहयोग ही वह शक्ति है,

जिससे रोशन हर परिवार है।


डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा"

पंजाब 

दान ना कर सके तो क्या फायदा - जितेन्द्र टेलर (जीत)



दान ना कर सके तो क्या फायदा - जितेन्द्र टेलर (जीत) 

जिंदगी में कमायें हो लाखो मगर, दान ना कर सके तो क्या फायदा ।
जो मिला है एक दिन वो लूट जाएगा, कुदरत का रहा है यहीं कायदा ।

सीखों सागर बादल और नदियां से, पाकर जल, जल सब में बांटना ।
सीखों पर्वत शिखर भ्रंश घाटियों से, मानव के लिए स्वयं को पाटना ।
सीखों पेड़ो के फूल पत्ती और शाख से, अंग परहित उपकार में काटना ।
सीखों चोंच भरें दाना पक्षियों से, धन ज़रूरत से हो ज़्यादा तो त्यागना ।
सदियों से है समर्पित समष्टि लिए, संकुचन भाव आया न यदा कदा ।

अपने अन्न और धन का करके दान, भूख प्यास किसी मिटाओ तुम ।
अपने भूज बल के तेज प्रताप से, दुष्ट से दीन दुखी को बचाओ तुम ।
पथ अंधेरे व अज्ञान जो अग्रसर, उनके मध्य दीप ज्ञान जलाओ तुम ।
अपने श्रमकण उज्ज्वल मौक्तिक से, धरती मां को फिर सजाओं तुम ।
प्रेम करूणा शरण ज्ञान क्षमा का भी, रहो दान करते जगत में सदा ।

ईश्वर का है आशीष तुम पर की, दान का मिला तुमको अधिकार है ।
सुख के सागर से तुम हीरे मोती लिए, धन वैभव भरा एक संसार है ।
धन संचित तेरे कर्मफल से जो है, वह किसी की खुशी का आधार है ।
दान दो मानव को समझ मानव, न बढ़े जिससे फिर मन अहंकार है ।
ग्रंथ वेद पुराणों में लिखा यही, दान से दाता की बढ़ती सुख संपदा ।

दान भाव मानव के अतंस में, विश्व कल्याण का है सशक्त प्रमाण ।
दान के पात्र अपेक्षित जन की, दानी को रखनी होगी कोई पहचान ।
ध्येय हो दान से दीन और देश का, नितप्रति ही रहे होता कल्याण ।
न की बंद आंखों से लुटाकर धन, कर दो शैतान को महा बलवान ।
दान अमृत बूंद सा बन दे जीवन, दान से है हो जाती खड़ी आपदा ।

जितेन्द्र टेलर (जीत) 

राजस्थान