Monday, 28 September 2026

ऑनलाइन - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

ऑनलाइन - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
 
आज ऑनलाइन का बोलबाला है।
ऑनलाइन बड़ा निराला है।
जब कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या व्यक्ति किसी कंप्यूटर नेटवर्क या इंटरनेट से जुड़ा होता है, वह ऑनलाइन कहलाता है। 
दुनिया के कोने-कोने की जानकारी, ऑनलाइन से पाया जाता है।

आँख खुलती नहीं, हमारा हाथ जाता है मोबाइल पर।
अपनी फोटो पर लाइक और कमेंट देख, मुस्कान आता है चेहरे पर।
हम आज ऑनलाइन की दुनिया में जी रहे हैं।
ऑनलाइन खरीदारी, ऑनलाइन व्यापार, ऑनलाइन शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
अब दफ्तर जाने की जरूरत नहीं, घर से काम हो जाता है।
मनुष्य अपनी 
सुविधानुसार कार्य करता, समय भी बच जाता है।
बीमार व्यक्ति, ऑनलाइन परामर्श पा जाता है।
कई चिकित्सकों की सलाह, वह ले पाता है।
हर सुविधा मनुष्य, घर बैठे पा रहा।
ऑनलाइन से मानव उन्नति कर रहा, सफलता की सीढ़ी चढ़ रहा।
ऑनलाइन छात्र पढ़ाई करते, होते हैं सफल।
छात्र प्रगति करते, बढ़ता उनका मनोबल। 
किसी भी चीज की अति, बड़ी बुरी होती है।
ऑनलाइन के प्रयोग में, कुछ सावधानियां रखनी जरूरी है।
तुरंत विश्वास न करें, पूरी छानबीन करें‌।
विज्ञापनों पर न जाए, 
खरीदने के पहले जांच-पड़ताल करें।
ज्यादा ऑनलाइन रहना, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। 
आँख पर असर पड़ता, सर दर्द, गर्दन, पीठ के दर्द का कारण है।
ऑनलाइन ठगी और धोखा घड़ी के शिकार हम होते हैं। 
हम ऑनलाइन की दुनिया में इतना खो जाते हैं, व्यक्तिगत रिश्ते कमजोर होते हैं।
बार-बार हम मोबाइल देखते, एकाग्रता हमारी कम होती।
गाड़ी चलाते समय मोबाइल का उपयोग करने से दुर्घटना होती।
ऑनलाइन पर ज्यादा निर्भर न रहे, आमने-सामने होकर बातें करें। 
कभी-कभी चिट्ठी लिखे, केवल मोबाइल पर मैसेज न करें।
मोबाइल के दोस्त काम कम आते हैं, अपने रिश्तेदार ज्यादा।
व्हाट्सएप, फेसबुक से ज्यादा अपना रिश्ता हमें संभालना है, खुद से करो यह वादा।
कभी-कभी विज्ञापन में जो दिखता है, वह सही नहीं होता।
जब सामान घर आता कभी-कभी वह विज्ञापन जैसा नहीं होता।
ऑनलाइन से पढ़ाई करो, अपना ज्ञान बढ़ाओ।
अच्छी बातें सीखो, 
समाज में नाम कमाओ।
ऑनलाइन रहें, मगर आँख मूँद कर विश्वास न करें।
अपना विवेक का उपयोग करें, तभी पांव आगे धरें।
 
डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
स्वरचित
West Bangal 

आनलाइन - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 

आनलाइन - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर 

आनलाइन सुविधाओं से
हर सुविधाएं मिल जाती है ।
पैसों की बैंकिंग सेवाओं का
लेन देन आनलाइन होता है ।

आनलाइन शापिंग होती है
पीज़ा वरगर भी आ जाता है ।
खाना जो भी खाना हो सब
आनलाइन ही आ जाता है ।

फेसबुक वाट्सएप गूगल हो
फायदा नुकसान तो होता है ।
चलाने वाले के ऊपर है
क्या उससे हासिल करता है ।

सोशल मीडिया की तकनीक से
घर बैठे ही बहुत हासिल होता है ।
वाट्सएप के माध्यम से सभी को
आनलाइन सब मिल जाता है ।

सारा सच है मोबाइल के माध्यम
फेसबुक वाट्सएप गूगल से जुड़ते हैं।
यूट्यूब इंटरनेट से भी जुड़कर
मोबाइल से हासिल कर सकते हैं ।

साहित्य के क्षेत्र में साहित्यकार
आनलाइन कवि सम्मेलन करते हैं ।
आडियो वीडियो टाइप कविता
फेसबुक वाट्सएप में भेजते हैं ।

3000 आनलाइन कवि सम्मेलनों में 
10000 सम्मान पत्र पाये है ।
मैंने तो आनलाइन सम्मेलनों में 
समय के साथ सम्मान पाते हैं।

सारा सच है आनलाइन सभी
आज कल काम आसान होते हैं ।
आनलाइन सम्मान आ जाते
ऐसे कवियों को फायदा होते हैं ।

आनलाइन मेरे सम्मान आते थे 
साहित्य साथी मजाक उड़ाते थे।
मुक्त होगी जब खुद बने  तब 
बात समझ लो पाये था।

इंटरनेट के माध्यम से लेन देन
काम सभी मोबाइल से होते हैं।
बैंकों में पैसे जमा हो जाते हैं
बिजली के बिल भी भरे जाते हैं।

आनलाइन शापिंग भी होती है
कहीं से भी कोई सामान आ जाता है।
सारा सच आने जाने की जरूरी नही 
आनलाइन पैसा भी चला जाता है ।

गलत काम जो करते हैं
वो लोगों को झूठा फसाते हैं ।
दो नंबर का काम भी करते हैं
नुक़सान सभी को पहुंचाते हैं ।

  महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
   जबलपुर म प्र

आनलाइन - काव्य शिरोमणि वरिष्ठ कवि

आनलाइन - काव्य शिरोमणि वरिष्ठ कवि
  *****
ऑनलाइन की दुनिया निराली, 
दूरियां लगती छोटी सी प्याली ।

घर बैठे संसार से जुड़ जाते, 
पल में संदेश कहीं पहुंचाते ।

ज्ञान का सागर  सामने आता, 
हर प्रश्न का तुरंत मिल जाता। 

पढ़ना हो  या  कुछ भी सिखलाना, 
ऑनलाइन ने सरल किया जमाना। 

 देश - विदेश से खबरें है मिलती, 
 नई-नई जानकारियाँ से खिलती। 

 व्यापार  हो  या हो सुंदर पढ़ाई, 
 ऑनलाइन ने तुरंत राह दिखाई।

 पर  इतना  भी  ध्यान  रहे भाई, 
 आभासी दुनिया सच नहीं भाई। 

 रिश्तों  की  गर्माहट  मत  खोना, 
 अपनों से संवाद कभी मत रोना। 

 मोबाइल को मालिक मत बनाना, 
 समय को यूँ  ही व्यर्थ न गँवाना।

तकनीक बने हैं जीवन की साथी, 
तभी बनेगी राह सुखद की साथी। 

 ऑनलाइन से ज्ञान को बढ़ाएं,
 पर  जीवन  में मानवता लाएं। 

 विज्ञान  तभी  सुंदर कहलाए,
 जब इंसान को  इंसान बनाए।

 ऑनलाइन जग से जुड़े जरूर,
 पर  अपनेपन  से नहीं  हो दूर।

 पर   उपकार   कुशल   है  मेरे, 
 कितना समझाऊं औरों को तेरे।

 ना  जाने  संवाद  कहां  से आ जाए, 
 हो सकता है,सुखद संवाद आ जाए।

 कवी “सुरेश कंठ “ का  यही  है कहना, 
 हर समय मोबाइल  को पास  ही रखना।
                जयहिंद 
                 *****
 रचयिता :- काव्य शिरोमणि वरिष्ठ कवि
 “सुरेश कंठ “ अररिया बिहार। 
        मो० 99312 30828


नाम - काव्य शिरोमणि 
     वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ,
    बथनाहा,अररिया बिहार

युद्ध नहीं बस अब विश्व शांति चाहिए - ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव

 युद्ध नहीं बस अब विश्व शांति चाहिए - ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव

(अंतर्राष्ट्रीय विश्व शांति दिवस-विशेष)

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।

चार छः देशों में अहं आगे,कैसी ये मची तबाही है।
शहरों की सुंदरता बिगड़ी,ये खंडहर ही गवाही है।।

जहाँ भी देखें वहीं मची है,चारों तरफ ये तबाही है।
अहं और दादागिरी से हो,रही यह भारी तबाही है।।

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।

जानमाल व्यवसाय गृहस्थी,परिवारों की बर्बादी है।
स्त्री पुरुष बूढ़े बच्चे जवाँ,से खाली ये आबादी है।।

अच्छे खासे मकां इमारत,की रोज होती बर्बादी है।
बस केवल खूनी एक तमाशा,शहनाई न शादी है।।

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।

मानवता भी कराह रही है,ऐसा ये अहं है टकराया।
बड़े-बड़े शहरों को इसी,युद्ध ने खंडहर है बनाया।।

चाहे हो ईरान-अमेरिका-इजराइल,खौफ है छाया।
या फिर हो रूस-यूक्रेन,चार वर्षों से थम न पाया।।

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।

सेना सैनिक एवं नागरिक,जंग लड़ रहे हैं यूक्रेन में।
रूसी फौजें कहीं ना कहीं,कहर बरपाते यूक्रेन में।।

इजराइल-अमेरिका मिल,लड़ रहा अकेले ईरान में।
कोई नहीं जंग में पीछे है,सभी डटे युद्ध मैदान में।।

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।

तोप टैंक मिसाइल चापर,फाइटर प्लेन गिराते बम।
रूस-यूक्रेन दोनों अड़े-खड़े,एक दूजे से न हैं कम।।

न ही अमेरिका-इजराइल,और ना ही ईरान है कम।
एक दूजे पर बरस रहा है,रुक-रुक कर गोला बम।।

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।

हर रूसी एक्शन का देता,यूक्रेनी लड़ाकू हैं जवाब।
आज तक टीवी न्यूज़ के,युद्ध कवरेज का जनाब।।

देख रहा या जो देखा था,वही पंक्तिबद्ध सब साब।
कुछ गलत लिखा है यदि,तो करना मुझको माफ।।

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।


सर्वाधिकार सुरक्षित ©®

रचयिता :
*ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.
(शिक्षक कवि लेखक साहित्यकार समीक्षक समाजसेवी)

टेलीपैथी का चमत्कार (मन से मन के तार) - जौली अंकल

टेलीपैथी का चमत्कार  (मन से मन के तार)

कल्पना कीजिए कि आप किसी सुनसान रेगिस्तान या घने जंगल में भटक गए हैं। मोबाइल की बैटरी खत्म हो चुकी है और नेटवर्क गायब हैं। ऐसे में अगर आप बिना फोन या बिना किसी साधन के सिर्फ अपने दिमाग से अपने दोस्त को यह संदेश भेज सकें कि भाई पिज्जा लेकर तुरंत यहाँ पहुँच जाओ और वह आपकी बात सुन ले। सुनने में यह थोड़ा फिल्मी और मजेदार जरूर लगता है, लेकिन बिना किसी साधन जैसे बोलना लिखना या इशारे के एक मन से दूसरे मन तक अपने विचारों और भावनाओं को पहुँचाने की इसी कला को टेलीपैथी या दूरानुभूति कहते हैं। इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले 1882 में फ्रेडरिक डब्ल्यू एच मायर्स ने किया था। जैसे टेली शब्द से टेलीविजन दूर की तस्वीरें दिखाता है और टेलीफोन दूर की आवाज सुनाता है, ठीक वैसे ही हमारा दिमाग भी एक कंप्यूटर की तरह दूर बैठे इंसान के विचारों को पकड़ सकता है। महाभारत काल में संजय के पास भी तो यही दिव्य दृष्टि थी, जिससे उन्होंने घर बैठे धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र के युद्ध का पूरा हाल सुना दिया था।

टेलीपैथी किस प्रकार कार्य करती है और इसका ढांचा क्या है, इसे समझने के लिए हमें रेडियो का उदाहरण लेना होगा। टेलीपैथी के मुख्य रूप से दो सबसे जरूरी हिस्से होते हैं। पहला ‘सेंडर’ यानी विचार भेजने वाला और दूसरा ‘रिसीवर’ यानी विचार पाने वाला। जब सेंडर अपने मन में कोई साफ विचार बनाता है, तो उसका अवचेतन मन विचार तरंगें बाहर निकालता है। यदि रिसीवर का मन भी शांत और एकाग्र हो, तो वह इन तरंगों को तुरंत पकड़ लेता है। उदाहरण के लिए कई बार आप अपनी मम्मी के पास जाने ही वाले होते हैं कि वे अचानक रसोई से आवाज देती हैं कि जरा बाज़ार से धनिया ले आना। या आप अपने किसी पुराने दोस्त को याद कर ही रहे होते हैं कि अचानक उसका फोन आ जाता है। यह कोई टोना टोटका नहीं बल्कि हमारे अवचेतन मन का वही अदृश्य नेटवर्क है जो अक्सर अनजाने में आपस में जुड़ जाता है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या टेलीपैथी का कोई वैज्ञानिक अस्तित्व है और इसके क्या फायदे हैं। अगर हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो आधुनिक विज्ञान प्रयोगशाला के नियमों पर टेलीपैथी को पूरी तरह से साबित नहीं मानता और इसे परामनोविज्ञान का विषय कहता है। हालांकि विज्ञान यह जरूर मानता है कि इंसानी दिमाग में अद्भुत ऊर्जा होती है। टेलीपैथी के फायदों की बात करें तो यह हमारी एकाग्रता और छठवीं इंद्री को बहुत मजबूती देती है। इसका सबसे बड़ा फायदा मुश्किल स्थितियों में हो सकता है जहाँ कोई तकनीक काम न करे। इसके अलावा यह इंसानी रिश्तों को गहरा बनाती है। जैसे कई बार बिना कुछ कहे ही आपकी बेस्ट फ्रेंड समझ जाती है कि आपका समोसा खाने का मूड है या ब्रेकअप का दुख। धर्म और अध्यात्म में इसे ध्यान की आखिरी सीमा माना गया है, जहाँ मन की शांति से आप किसी भी दूर बैठे व्यक्ति की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं।

कई लोग पूछते हैं कि क्या टेलीपैथी खुद से सीखी जा सकती है और इसे सीखने का तरीका क्या है। जी हाँ, इसे रोज के अभ्यास और मन के अनुशासन से सीखा जा सकता है। टेलीपैथी का अभ्यास करने के लिए सबसे पहले किसी शांत कमरे में बैठें, गहरी सांसें लें और अपने दिमाग से दिनभर की फालतू चिंताओं को बाहर निकाल दें। इसके बाद अपनी आंखें बंद करके अपने किसी करीबी दोस्त या घर के सदस्य का एकदम साफ चेहरा दिमाग में बनाए। अब अपने संदेश को बिल्कुल छोटा, सरल और साफ रखें, जैसे मुझे याद करो या मुझे तुरंत कॉल करो। इस संदेश को अपने मन में दोहराएं और सोचें कि रोशनी की एक किरण आपके दिमाग से निकलकर सीधे आपके दोस्त के दिमाग में जा रही है। संदेश भेजने के बाद सब्र रखें और पूरा विश्वास बनाए रखें। शुरुआत में अपने किसी प्यारे दोस्त के साथ इसका रोज 10 मिनट अभ्यास करें। हो सकता है कि पहले दिन वह आपको सिर्फ मैसेज में पूछे कि और भाई क्या हाल हैं, लेकिन यही आपके दिमाग के बिना तार वाले नेटवर्क की पहली जीत होगी।

आज का मानव ज्ञान और तकनीक के इस दौर में बहुत आगे बढ़ चुका है। हम चांद और मंगल तक पहुँच गए हैं, लेकिन दुख की बात यह है कि इतना ज्ञान होने के बाद भी इंसान की सोच कभी-कभी संकीर्ण, हिंसक और मूर्ख बनी रहती है। हम हजारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति से वीडियो कॉल पर तो बात कर लेते हैं, लेकिन पास बैठे इंसान के दिल का दर्द नहीं समझ पाते। टेलीपैथी हमें सिखाती है कि हमारी सबसे बड़ी शक्ति हमारे भीतर ही छिपी है। अगर हम अपने अवचेतन मन की गहराई को समझ लें और अपने मन को शांत करना सीख जाए, तो हमें किसी इंटरनेट नेटवर्क की जरूरत नहीं पड़ेगी। टेलीपैथी केवल एक रहस्यमयी विद्या नहीं बल्कि मन की शुद्धता, एकाग्रता और आपसी जुड़ाव का एक खूबसूरत जरिया है। तो जौली अंकल की बात मान कर बिना देर किये ही अपनी आंखें बंद कीजिए, अपने दिमाग का नेटवर्क चालू कीजिए और अपने किसी खास दोस्त को मन ही मन संदेश भेजकर देखिए कि आपके दिल की बात उसके मन तक पहुँचती है या नहीं।
- जौली अंकल