Thursday, 25 June 2026

मेल मिलाप” दो शब्दों का मेल नहीं, बल्कि - नेहा बागड़ी

मेल मिलाप” दो शब्दों का मेल नहीं, बल्कि - नेहा बागड़ी

इंसानियत की सबसे खूबसूरत परिभाषा है। जिसका अर्थ है दिलों के बीच की दूरी को मिटाना, और गिले-शिकवे भुलाकर नए रिश्ते बनाना। यह वह धागा है जो अलग-अलग रंग, धर्म, भाषा और सोच वाले लोगों को एक माला में पिरो देता है।
परिवार के सदस्यों में अगर यह भाव मौजूद हो तो छोटी-छोटी बातें बड़ी नहीं बनतीं। तीज-त्योहार पर सबका साथ बैठना, एक-दूसरे की सुनना यही घर को घर बनाता है। गाँव में चौपाल, शहर में मोहल्ला समिति, स्कूल में दोस्तों का समूह ये सब इसी भाव की छोटी पाठशालाएँ हैं। भारत जैसे विविधता भरे देश में 140 करोड़ लोग सिर्फ इसी भावना से ही एक साथ खड़े हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, हर बोली-हर रिवाज को अपनाना ही हमारी असली ताकत है। वैर-भाव पालने से मन अशांत रहता है। माफ करना, गले लगाना, पुरानी बात भूल जाना बेहतर है। इससे हम रिश्तों को टूटने से बचा सकते हैं।
ईद की सेवई हो या दिवाली की मिठाई, जब हम एक-दूसरे के घर जाकर त्योहार मनाते हैं तो ‘अपना-पराया’ का फर्क मिट जाता है। हमें अपने बच्चों को दूसरों के साथ मिलकर रहना, अच्छा व्यवहार, बड़ों का आदर करना सीखाना चाहिए क्योंकि ये बच्चें ही समाज को जोड़ने का कार्य करेंगे।
मेल-मिलाप वो प्रेम का धागा है जो हमारे परिवारों को, समाज को, देश के लोगों को बांध कर रखे हुए है अतः इसे सँभाल कर रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। आओ, मेल मिलाप को अपना स्वभाव बनाएँ — क्योंकि जुड़ने में ही जीत है।

नेहा बागड़ी
भिवानी (हरियाणा) 

स्वाभिमान - अश्विनी देशपांडे

स्वाभिमान - अश्विनी देशपांडे

“साहब–साहब, बचा लो, साहब।”आदिवासी महिला जमुना, घायल हिरनी–सी, गिरती– पड़ती पुलिस स्टेशन में दाखिल हुई।
“ अरे,क्या हुआ? कहां घुसी चली आ रही है?” हवलदार बोला.
“साहब, मुझ पर अत्याचार हुआ है.”
रोटी–बिलखती जमुना अपनी फटी साड़ी से तन ढकने की कोशिश करती है।
“ किसने किया है?”हवलदार ने कड़क आवाज में पूछा.
“ गांव के दबंगों ने.” हिचकियां लेती जमुना ने कहा।
“ क्या? पागल हो गई है! कुछ भी बोले चले जा रही है.”
“ साहब,मैं सच कह रही हूं .”
“तू रुक.” कह कर हवलदार फोन करता है।
“ सर जी, जमुना यहां आई है. क्या करना है?”
“ जी.”
“ सुन जमुना, मेरी सर जी से बात हुई है। बात का बतंगड़ न बना। चुपचाप समझौता कर ले।”
जमुना तड़ाक से खड़ी हुई ।लाल जलती आंखों से हवलदार की तरफ देखा और कहा “भले ही मेरा सब दांव पर लग जाए, अपमान का बदला समझौता हरगिज नहीं होगा।” और लंबे-लंबे डग भरती बाहर निकल गई।

अश्विनी देशपांडे

समाधान - ललित कुमार शर्मा

समाधान - ललित कुमार शर्मा

राह में बाधाएँ बहुत हैं
चलो कोई समाधान ढूंढें
छोड़ अपनी ये आवारगी
चलो कोई एक अरमान ढूंढें

आज जिस तरफ भी देखो
बिखरी पड़ी इंसानियत है
छोड़कर हम हैवानियत को
चलो कोई नेक इंसान ढूंढें

लूटता फिर रहा है जो
माँ बहनों की अज़मियत को
आज दें उसको सज़ा हम
चलो सब वो हैवान ढूंढें

हर कोई है परेशान कितना
देखकर मेरी हैसियत को
रहें जहाँ हम सब मिलकर
चलो वो इक जहान ढूंढें

खो रहे घर आज सबके
हम बड़ों की अहमियत को
हो जिस घर में दादी नानी
चलो वो इक मकान ढूंढें

सोए हुए सब रिश्ते हैं सारे
कोई न पूछे यहाँ खैरियत को
ये दुनियादारी जो ना समझे
चलो ऐसा इक नादान ढूंढ़े

राह में बाधाएँ बहुत हैं
चलो कोई समाधान ढूंढें
चलो कोई समाधान ढूंढें

*स्वरचित एवं मौलिक रचना
ललित कुमार शर्मा
नई दिल्ली

समझौता - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

समझौता - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

(प्रतियोगिता हेतु साहित्यिक कविता)
समझौता करना पड़ता है,
जीवन की हर राह में,
कभी सपनों को मोड़ना पड़ता,
कभी अपनों की चाह में।
मन चाहे ऊँचे पर्वत छूना,
आसमान में उड़ जाना,
पर जिम्मेदारी के धागों से,
धरती पर ही जुड़ जाना।
कभी शब्दों को पी जाना,
कभी आँसू भी सह लेना,
कभी हार को गले लगाकर,
मुस्कानों में ढल लेना।
हर समझौता कमजोरी नहीं,
यह जीवन का ज्ञान है,
जो समय के संग चलना सीखे,
वही सच्चा इंसान है।
लेकिन इतना याद रहे,
स्वाभिमान न बिकने पाए,
लाख समझौते कर लेना,
पर सत्य न झुकने पाए।
जीवन की इस लंबी डगर में,
यही अनुभव का नाता है,
जो संतुलन रखना सीख गया,
वही जीवन जी पाता है।
समझौता यदि विवेक से हो,
तो वह शक्ति बन जाता है,
और यदि अन्याय से हो,
तो मन को बहुत रुलाता है।
इसलिए समझौता करना,
सोच-समझकर ही सीखो,
सत्य, प्रेम और स्वाभिमान संग,
जीवन का दीपक लिखो।॥

डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

समझौता - समाधान - डॉ अशोक जाटव

समझौता - समाधान - डॉ अशोक जाटव 

कोई भी हो कार्य करो समझौता
तभी होगा समाधान
जब आए कोई परेशानी
न लाओ कोई हैरानी
बिचौलिया ही है इसकी साझेदारी
किसी से चाहे ही कैसे संबंध
हर कार्य का करो अनुबंध
जब सही हो इकरार
तो कैसे होगी तकरार
रखो सभी से मेल मिलाप
करो सुलह तो क्यों व्यर्थ
करते हो प्रलाप
करो संधि तो हल होगा
संधि से ही आज रहेगा
तभी तो कल होगा
चाहे हो व्यापार या हो हर कार्य
करो बार्गेनिंग
चाहे हो मॉर्निंग
या इवनिंग
मध्यस्थता हो हर कार्य
रखो सभी में स्वीकार्य
न करो किसी से तोड़ जोड़
न करो किसी से व्यर्थ होड़
न मारो किसी का हक
ईमानदारी ही है हर कार्य की चमक
चाहे कितनी बड़ी हो रियासत
हो कितनी बड़ी मिल्कियत
समझौता ही कराता समाधान
कभी चोरी मत करो कराधान
हर कार्य का ही मिल बाट कर करो समाधान
सभी बातों का रखें ख्याल
चाहे हो अमीर या कंगाल
मध्यस्थता ही है सभी का सुगम हल।

*डॉ अशोक जाटव व्याख्याता भोपाल मध्यप्रदेश*