Thursday, 28 May 2026

पूजा - डा अनन्तराम चौबे अनन्त

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी 
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
पूजा - डा अनन्तराम चौबे अनन्त

मंदिर तो पूजा घर होता है
वहां पर रहते भगवान हैं ।
कण कण में भगवान है
रोम रोम में भगवान हैं ।

भगवान के मंदिर में सभी 
श्रद्धा आस्था विश्वास से जाते हैं
छोटा बड़ा जो भी मंदिर हो
भगवान वहां पर रहते हैं ।

प्रसाद के लड्डू में मिलावट 
कोई अधर्मी ही करता है ।
जाति धर्म बदनाम करने को
साजिश ऐसी कोई करता है ।

धर्म में श्रद्धा आस्था जो रखता है 
 मंदिर से भी वो जुड़ा रहता है ।
गृहस्थ जीवन को जीकर भी
जीवन अपना सफल बनाता है ।

मंदिर में ईश्वर की पूजा करना
समय मिले ध्यान लगाना ।
मनुष्य का तन मिला है तो
पूजा भक्ति भी करते रहना।

सुखमय जीवन जीना है
तो परोपकार भी करना है ।
सारा सच है जैसी सामर्थ हो
परोपकार भी, वैसा करना है ।

मंदिर में पूजा पुण्य का काम है
पुण्य का फल मीठा मिलता है ।
आज नहीं तो कल मिलता है
जीवन भी सुख मय रहता है ।

धर्म पूजा में श्रद्धा जो रखता है
फल भी उसको  मिलता है ।
परोपकार करने वाला ही
सबकी दुआएं पाता रहता है ।

तुलसी, आंवला, पीपल के
वृक्षों की पूजा भी करते हैं ।
हिन्दू धर्म में मान्यता है कि 
इन वृक्षों में ईश्वर वास करते हैं।

माता पिता की सेवा करना
कभी दुखी न उनको रखना ।
माता पिता की सच्ची सेवा ही
ईश्वर की जैसे पूजा करना है ।

 माता पिता पहले गुरु है
पहली शिक्षा उन्ही से मिलती।
देवी देवताओं का ज्ञान कराते 
पूजा पाठ सीखने मिलती  ।

सच्ची राह किसी को दिखाना
सारा सच पुण्य का काम होता है। 
छोटा छोटा श्रम दान करो तो
वो भी परोपकार ही होता है ।

प्यासे को पानी पिला दो
भूखे को दो रोटी खिला दो ।
पक्षियों को दाना खिला दो
मंदिर में पूजा जैसा होता है ।

महिलाएं अक्सर ही मंदिर में 
भजन कीर्तन करती रहती है ।
घर परिवार में खुशियां रहें
मंदिर में यही कामना करती है

पूजा, भक्ति ,धर्म कर्म भी
श्रद्धा से जीवन में करना है ।
सारा सच है मोक्ष मिलेगा 
जीवन जो सार्थक करना है ।

  महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
  जबलपुर म प्र

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नफरत जिंदा है प्यार से* - संजय जैन "बीना"

नफरत जिंदा है प्यार से*
विधा : कविता

मन से कोई भाग न पाया। 
दिल से क्या तुम भागोगें। 
प्यार मोहब्बत के बंधन को। 
क्या पवित्रता से निभाओंगे।। 

हर मौसम में आंधी है। 
हर मौसम में प्यार बहुत। 
जीने के तरीके अलग है। 
पर परिभाषा सबकी एक है।। 

बिना स्नेह और मिलनसार का। 
जीवन बिल्कुल शून्य है। 
आंधी आये तूफान आये। 
प्यार कभी कम होता नही।। 

नफरत को जिंदा रखने को। 
प्यार का होना जरूरी है। 
देख प्यार को लोगों के तब। 
नफरत जलन काम करती है।। 

जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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त्याग का रहस्य - अमिता मराठे, मध्य प्रदेश

त्याग का रहस्य - अमिता मराठे, मध्य प्रदेश 

घने सेमर वृक्ष के नीचे एक साधु विश्राम कर रहे थे। सूर्य की तपन से राहत मिलते ही उन्हें गहरी नींद आ गई।

शीतल हवा और घनी छाया मानो उनकी तन-मन से सेवा कर रही थीं। जागने पर साधु स्वयं को अत्यंत हल्का और प्रसन्न महसूस करने लगे।

उन्होंने वृक्ष की ओर देखकर कहा—
“हे सेमर वृक्ष! मैं आपका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।”

वृक्ष मंद स्वर में बोला—
“हे महात्मन्! हमारा धर्म तो केवल देना है। त्याग और समर्पण ही हमारे जीवन के भाव हैं। सामने खड़े मेरे बंधु बरगद को देखिए, जो वर्षों से समस्त प्राणी जगत को निःस्वार्थ दान दे रहे हैं। धरती माँ ने हमें अपनी गोद में स्थान दिया देकर स्नेह दिया है, इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम भी सबका संरक्षण करें।”

साधु ने गंभीर होकर पूछा—
“हे वृक्षराज! आज पृथ्वी पर ऐसी विषम परिस्थितियों का दोषी कौन है?”

सेमर वृक्ष कुछ क्षण मौन रहा, फिर बोला—
“यह प्रकृति और माया का संघर्ष है। माया ने मनुष्य की बुद्धि पर ताला जड़ दिया है। मनुष्य के माध्यम से वह विनाश का तांडव रच रहा है। भगवान ने मनुष्य को विवेक दिया था, ताकि वह नैतिकता और संस्कारों का पालन छंकरे, परंतु उसने उसी विवेक को स्वार्थ की आग में झोंक दिया।”

वृक्ष की वाणी और तीखी हो उठी—
“हम दोनों पृथ्वी की गोद में पले हैं, फिर भी अंतर देखिए—
हम वृक्ष पत्थर खाने पर भी फल देते हैं,
और मनुष्य फल खाने के बाद भी कुल्हाड़ी चलाता है।”

साधु निःशब्द थे।
धरती माँ की पीड़ा अब उन्हें स्पष्ट सुनाई दे रही थी।

— अमिता मराठे, मध्य प्रदेश 
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दर्दे दिल जिगर का अफसाना कैसे कहूं - उमेश नाग

दर्दे दिल जिगर का अफसाना कैसे कहूं - उमेश नाग

दर्दे दिल जिगर का अफसाना कैसे कहूं,
वो रूठ जातें हैं हम
बहुत सहम जाते हैं।
वो जब जब नजदीक 
होते हैं शिकायतें दूर हो 
जातीं हैं,
मासूम दिल को दवा मिल 
जातीं हैं।
रोग भी तुम ही हो जो नही 
आतें मिलने,
जो तुम आ जाओ मिलनें
प्रणय की दवा हो जाऐं।
मेरे दर्दे दिल की हर औषधि 
तुम ही हो,
 लाख ही बचना चाहो तुम,
 बच न पाओगे तुम मेरे दर्द
 ‌ दिल से।
  जो जख्म दिए हैं तुमने मुझे 
  दवा उसकी भी तुम हों।
  तुम्हारा हमनवां मैं ही हूं,
   कितना भी प्रयत्न करों,
   दिल में तो मैं ही मैं हूं।
   दर्द भी मैं ही हूं,
   दवा भी मैं ही हूं तुम्हारा।
   तन्हा न समझना खुद को 
   तुम,
    तेरी मंजिल भी मैं ही हूं,
    और रास्ता भी मैं ही हूं।
    कांरवा जो चलें तेरे साथ,
    वो भी मैं ही हूं,
    तुम्हारे जख्मों के दर्द भी 
     मैं ही हूं दवा भी मैं ही हूं।

                    श्रीमती उमेश नाग जयपुर राजस्थान
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बलि - डा, तरूण राय कागा

बलि - डा, तरूण राय कागा

अंधविश्वास के वशीभूत होकर पशूओं की चढती बलि,
 आत्मविश्वास के वशीभूत हत्या पशूओं की चढ़ती बली।

     एक वर्ग करता ह़लाल दूसरा झट-पट झटका,
      पीते मदिरा खाते मांस चाव से चढती बलि।

कोई कुर्बानी करता खैरात कोई मन्नत मुराद चढ़ावा,
बांटी जाती प्रसादी बकरा भैंसा की चढ़ती बलि।

        अमुक आस्था स्थलों पर बंटता प्रसाद गोश्त का,
        बेजुबान कटते जीव धड़ा-धड़ बेधड़क चढ़ती बलि।

अब सभ्यता संस्कृति में मची हड़कंप खलबली कागा,
रोक-थाम होने लगी फिर भी चढ़ती बलि।

क़लमकार 
डा, तरूण राय कागा 
पूर्व विधायक 
कवि साहित्यकार

राजस्थान 
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