कविता / दीपक अनंत राव
किसी से मिलेगी अब,
खोई हुई मेरी पहचान၊
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मेरी कक्षा में
एक छात्र ने पूछा कि
दोस्ती का क्या मतलब होता है?
अकेला रहना,
अपनी ही छाया में चलना,
आईने से बातें करना,
आसमान के तले अपने छाते में रहना,
आरज़ू का मतलब न समझना,
आँसुओं की नमी न पहचानना,
दर्द की दवा न अपनाना,
जिसे यह सब लगे,
वह दोस्ती का क्या मतलब समझता है?
वह रोज़ ढूँढता था,
रोज़ ढूँढता है,
जवाब कई सवालों का,
जो घर में दादा जी,
परदादा दोहराते थे,
जो बातें बुजुर्ग कहा करते थे।
सवालों के ऊपर सवाल, कड़वे सवाल၊
खेत क्या है,
कैसे दिखता है?
पेड़ का क्या मतलब होता है?
घोंसले में कौन रहता है,
नदी का क्या अस्तित्व है,
लहरों का कैसा निमंत्रण है,
वनस्पति का क्या संदेश है?
आज वह टूटा हुआ
एक पुराना टुकड़ा लेकर,
पूछता है कि इसमें क्या रगड़ा हुआ-सा है!
वह 'स्लेट' पर हिंदी का पहला शब्द
'अ' ही चमकता था!
तकनीक की दुनिया में,
शीतलीकृत सभ्यता में,
कुछ कड़े सवालों के जवाब,
किसी को भी कभी मिलते ही नहीं।
अब कहीं भी बचा है,
सिर्फ एक नारा मोबाइल फोन का၊
अन्य कई नारे बरसों पहले
इतिहास हो चुके हैं।
मैं चुप रहा,
सहमा, लेकिन
बच्चा हमेशा बच्चा ही होता है,
वह अपनी बातें दोहराने को सदा उत्सुक था।
सभ्यता की बैसाखी को मैंने
ज़मीन में गाड़कर
पल-पल, पल-भर
घसीटता रहा, चलता रहा।
अंत में किसी सवाल के बिना
एक वल्मीक में छिपा हूँ मैं।
किसी से मिलेगी अब,
खोई हुई मेरी पहचान ॥
®©दीपक अनंत राव,
कवि एवं अध्यापक
केरलम

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