राष्ट्र का आवाह्न
*" जागो रे.... अब देश बचाओ वक्त का यह आवाह्न है* ,
*संकट में है देश का गौरव , संकट में स्वाभिमान है* ।
*" स्वर्ण रजत* की कांति मलिन , बाजारों में हाहाकार है ,
*ईंधन* की वेदी पर झुलस रहा , मध्यम वर्ग संसार है ,
*खाध तेल* की लपटों से, जुझ रही जन-जन की थाली है ,
*महंगाई* के इस तांडव ने, हर घर की रौनक हर डाली है ।
*सिंहासन* से गूंज रही आज, विवशता भरी पुकार है ,
*विदेशी मुद्रा* की रक्षा में , संयमित यहीं व्यवहार है,
त्यागो तुम *परदेश की यात्रा*, देश कोष को अब बल देना है ,
निजी सुखों की आहुति देकर , हर संकट से लोहा लेना है ।
*वर्जित हो स्वर्ण-क्रय इस वर्ष* , यह युग का कठिन संदेश है ,
आर्थिक चक्रव्यूह के सम्मुख खड़ा , संकट में आज स्वदेश है ,
*कारपूल* और *जन परिवहन* अगर , जन-जन का हथियार बने ,
इसी त्याग के बल पर ही *राष्ट्र* को *आत्मनिर्भरता* की नव श्वास मिले ।
दोषारोपण का समय नहीं , यह राष्ट्र धर्म की बेला है ,
*वैश्विक संकट* के तूफानों को अकेले भारत ने ही झेला है ,
*देश बचाओ को अब केवल नारा नहीं*, अंतर्मन का संकल्प बनाना है ,
*साधन सीमित*, *निष्ठा असीमित* इसी विकल्प से *भारत* का मान बढ़ाना है...!!
*"सिर्फ हुकूमत को कोसने से यह मंजर नहीं बदलेगा* ,
*जब तक हर शख़्स ना जागेगा , यह वतन कैसे संभालेगा* ? ?
*"जय हिन्द जय भारत"*
लेखिका - विदुषी प्रज्ञा...


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