Sunday, 1 November 2026

संरक्षण - वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ

संरक्षण - वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ

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 प्रकृति हमारी अनमोल धरोहर
 इसकी रक्षा  करना  है मनोहर

 पेड़  -  पौधा   का  सम्मान  करें
 हरियाली का काफी गुणगान करें

 जल संरक्षण है बहुत जरूरी 
 इसके बिन हर  खुशी अधूरी 

नदियों   को   निर्मल  रहने  दें
 जलधारा को अविरल बहने दें 

 वायु प्रदूषण  को  दूर  भगाएं 
 स्वच्छ हवा का सुख अपनाएं 

पशु - पक्षियों की रक्षा हो 
सबके जीवन में सुरक्षा हो

वन कटने से उसे रोक लगाएं
नए - नए पौधे  जरूर लगाएं

 मिट्टी का भी मान  को बढ़ाएं 
 उर्वर धरती को निश्चित बचाएं 

संस्कृति का संरक्षण करें 
सरकारों का संवर्धन करें 

भाषा, साहित्य का हो सम्मान
 इनसे बढ़ता है  देश  का मान 

ऐतिहासिक  धरोहर  बचाएं 
अपनी पहचान अमर बनाएं 

संविधान के मूल्यों का ज्ञान 
लोकतंत्र  की  यही  है शान 

मानवता  का   करें  संरक्षण 
प्रेम बने जीवन का आभूषण 

बालक,वृद्धि सभी सुरक्षित हों 
नारी के  अधिकार संरक्षित हों 

पर्यावरण का रखें विचार 
स्वच्छ बने  अपना संसार 

प्लास्टिक का उपयोग घटाएं 
कचरे का सही प्रबंधन बनाएं 

ऊर्जा  की  बर्बादी  को पहले रोकें 
बिजली की हर किरण को संजोएं 

धरती मां का कर्ज चुकाएं
आने  वाली  पीढ़ी बचाएं 

संरक्षण केवल बात नहीं है 
जीवन  की बड़ी सौगात है 

 मिलकर अपना फर्ज निभाएं
 सुंदर  भविष्य  सभी  बनाएं 

 बूंद -  बूंद  से सागर बनता 
 छोटा प्रयास बड़ा फल देता

 जीव- जगत का रखें ख्याल
 तभी बनेगा जीवन खुशहाल 

प्रकृति   से   है अपना  नाता 
इसके बिन अस्तित्व न भाता

 संरक्षण का दीप यहीं जलाएं
 जन - जन  में चेतना फैलाएं

 आज  बचाएं  वन  और  पानी 
 कल होगी खुशियों की कहानी 

 स्वार्थ छोड़कर आगे आएं 
 धरती  का  वैभव  लौटाएं 

 कर्तव्य का संकल्प उठाएं
 संरक्षण का  धर्म  निभाएं 

 यही प्रगति का सच्चा दर्शन
 जीवन का  आधार संरक्षण 

आओ  मिलकर करें प्रणाम 
प्रकृति बचाना अपना काम 

वरिष्ठ “कवि कंठ“ का कहना 
सही  बात  सभी  का  सुनना 
       —---  जय हिंद  —---

रचयिता-  वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ,
       बथनाहा, अररिया, बिहार।

किसान की बेटी: मिट्टी की पुकार - कल्याणी शंकर दुधबले

 किसान की बेटी: मिट्टी की पुकार - कल्याणी शंकर दुधबले

मैं एक सीधे-साधे किसान की बेटी हूँ, और रोज़ अपने पिता का वो गहरा दुख देखती हूँ,
जब वो पसीने से सींची धरती पर, कंक्रीट और कचरे का यह बढ़ता हुजूम देखती हूँ।
जिस माटी से मेरे पिता ने हम सबको पाला, आज वो ज़हरीली हो रही है,
बदलते पर्यावरण और सूखी फसलों को देख, उनकी आँखें रातों को सोती नहीं हैं।
वो दिन-रात खेतों में खटकर, अन्न से सबका पेट भरते हैं,
पर इंसानों की इस लापरवाही से, वो अपने बच्चों के भविष्य की चिंता करते हैं।
खेतों की मेढ़ों और नदियों के किनारे, जो प्लास्टिक का अंबार लग रहा है,
उसी सिंगल-यूज की जानलेवा लत से, मेरे पिता का हर सपना बिखर रहा है।
फसलों को निगलते इस प्लास्टिक पर, अब करारा वार करना होगा,
सरकार के इस पूर्ण प्रतिबंध को, हम सबको मिलकर स्वीकार करना होगा।
यह लड़ाई सिर्फ कागज़ों पर नहीं, हमें खेतों और गलियों तक ले जानी है,
देश के हर एक नागरिक को इसमें, अपनी सक्रिय भागीदारी निभानी है।
मेरे अन्नदाता पिता की मेहनत और इस पावन प्रकृति का, हमें मिलकर संरक्षण करना है,
तभी इस झुलसती हुई सुंदर धरा में, फिर से खुशहाली का नया रंग भरना है।
मिट्टी को बंजर होने से बचाना, यह केवल किसी एक का काम नहीं, हम सबकी है ज़िम्मेदारी,
तभी थमेगी प्रदूषण और विनाश की, यह चुपचाप पैर पसारती बीमारी।
हवा, अमृत नीर और खेतों की माटी की, समय रहते कर लो सुरक्षा,
किसान के आंसुओं को पोंछकर, आज कर लो इस पूरी कायनात की रक्षा।
उठो! एक किसान की बेटी की आवाज़ सुनो, एक नया संकल्प सजाना है,
प्लास्टिक मुक्त इस पावन धरा को, फिर से सोने की चिड़िया बनाना है

Name : Kalyani Dudhbade
कल्याणी शंकर दुधबले

Tuesday, 27 October 2026

दशहरा - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु
विषय... दशहरा - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर
कविता...

दशहरा

असत्य पर सत्य की
अधर्म पर धर्म की जीत हुई।
अन्याय पर न्याय की
दशहरा पर्व पर जीत हुई ।

विजयदशमी दशहरा पर्व है
बुराई पर अच्छाई की जीत है।
श्रीराम ने रावण को आज ही
विजयदशमी को ही मारा था।

रावणराज के अत्याचारों से
धरती पर अत्याचार मचा था।
साधु संत और महात्माओं का
जीना मुश्किल हो गया था ।

राक्षसों के अत्याचारों से
त्राहि त्राहि मची हुई थी ।
धर्म कर्म करना मुश्किल था
अधर्म का ही बोलबाला था ।

राक्षसों का विनाश करने
मैया दुर्गा अवतरित हुई ।
राक्षसों का बध करके
मां दुर्गा रूप में श्रेष्ठ हुई ।

महिषासुर कुम्भ निकुंभ वह
रक्त वीर सुंड़ मुंड का बध किया ।
ऐसे राक्षसों के अत्याचारों से
धरती माता को मुक्त किया ।

रावण के अत्याचारों से
भगवान विष्णु ने जन्म लिया ।
सारा सच श्रीराम रूप में रावण
का बध करने अवतार लिया ।

माता पिता की आज्ञा पालन
कर वनवास की राह बनाई थी।
सारा सच मर्यादा में रहकर भी
ऐसी श्रीराम ने लीला रचाई थी ।

सीता लक्ष्मण के साथ में ही
मर्यादा में रहकर वन वन भटके।
राक्षसों का अंत किए और साधु
संतों को अत्याचार से मुक्त किये।

राम रावण का युद्ध महाबली
हनुमान बिना अधूरा ही था ।
बजरंगबली जो कार्य किया है
वो किसी और के बस में नही था

समुद्र लांघकर लंका पहुंचे और
माता सीता का पता लगाया था।
अशोक वाटिका तहस नहस कर
रावण की सभा में बल दिखाया था

राम लक्ष्मण नाग पास में बंधे
हनुमान जी गरूड़ को लाये थे ।
नाग पास से मुक्त कराये और
नाग पास से मुक्ति पाते थे ।

लक्ष्मण को जब शक्ति लगी
सुखेन वैद्य को लंका से ले आए थे ।
उनकी बताई जड़ी बूटी को
पर्वत के सहित उठा लाए थे ।

ऐसे अनेक अद्भुत कारनामें
बजरंगबली करके दिखलाए थे ।
श्रीराम की सेना के बल साहस
क़दम क़दम पर बढ़ाए थे ।

विजयदशमी दशहरा को ही
रावण राज का अंत हुआ ।
सारा सच सच्चाई की जीत हुई
और बुराई का ऐसे अंत हुआ।

धर्म कर्म न्याय के देश में
अभी भी अत्याचार हो रहे हैं।
बदले की भावना से सवर्णों पर
एस सी एस टीएक्ट लगवाकर
बेगुनाह लोगों को जेल भेज रहे हैं।
और लाखों रुपया क्या रहे हैं
इन राक्षसों अत्याचार से बेगुनाह
लोगों के घर बर्वाद हो रहे हैं।

असत्य पर सत्य की जीत हो
अधर्म पर धर्म की जीत हो
अन्याय पर न्याय की जीत हो
अत्याचार का विनाश हो ।

महाकवि,डा अनन्तराम चौबे अनन्त
जबलपुर म प्र

दशहरा एक नजर में - वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ

दशहरा एक नजर में - वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ
                  —----   ×    —----
 दशहरा के पावन पर, 
 जागे सही सद्विचार। 
 
 सत्य धर्म की राह पर, 
 करें जगत  का उद्धार। 

 रावण का पुतला जलाने से, 
 मिटता नहीं विकार। 

 मन के भीतर छिपे रावण पर, 
 करना होगा प्रहार। 

 दस सिर वाले रावण का,
 इतिहास हमें बताता है। 

 ज्ञान,सत्य और अहंकार भी, 
 विनाश स्वयं बुलाता है। 

राम बने आदर्श हमारे, 
मर्यादा के धाम। 

सत्य,प्रेम और न्याय से, 
ऊंचा होता नाम। 

 क्रोध, लोभ और मोह मिटाएं,
 त्यागें मन का मान।

 ईर्ष्या ,लोभ और कपट छोड़कर,
 बनें सच्चे इंसान।

 नारी का सम्मान करें,
 यही धर्म का सार।

 जिस घर में नारी पूजित हो,
 खुशियाँ वहां अपार।

 जाति- धर्म के भेद बुलाकर,
 प्रेम का दीप जलाएं।

 मानवता के पथ पर चलकर,
 भारत का मान बढ़ाएं।

 अन्यायों के विरुद्ध खड़े हों,
 सच का साथ निभाएं।

 निर्बल को संबल देकर,
 मानव धर्म निभाएं।

 केवल पर्व मनाने से, 
 परिवर्तन नहीं आएगा।

 जब आचरण शुद्ध न होगा,
 अंधकार नहीं जाएगा।

 रामराज का स्वप्न तभी,
 साकार यहां हो पाएगा। 

जब हर जन अपना कर्तव्य, 
ईमानदारी से निभाएगा। 

आओ मिलकर शपथ उठाएं,
सत्य की राह चलेंगे।

द्वेष मिटाकर प्रेम बाटेंगे, 
दीप  सद्भाव के जलेंगे।

 विजयादशमी यही सिखाती,
 सत्य कभी न हारता।

 धैर्य ,धर्म और नेक कर्म से,
 मानव का जीवन संवरता।

 कहते हैं” कविवर सुरेश कंठ “,
 सुलभ है यही मूल मंत्र।

 कभी नहीं इसे भूलना है,
 याद रखना है सही तंत्र। 
            जयहिंद 
       —----  ×  —----
    रचयिता ;- 
     वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ 
  बथनाहा,अररिया ,बिहार।

रावण - नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर

रावण - नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर 

रावण को बुराई का प्रतीक माना जाता है जबकि रावण ने स्वंय मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम से 
युद्ध करने कि चुनौती नहीं प्रस्तुत किया उसके सामने सिवा युद्ध के कोई विकल्प था ही नहीं!
ज़ब विदेह ने शिव धनुष भंग करने वाले से पुत्री सीता से विवाह कि प्रतिज्ञा कि तब महर्षि विश्वमित्र के साथ राम लक्ष्मण बिदेह दरबार मे धनुष भंग मे दर्शक रूप मे पहुंचे जबकि तत्कालीन बड़े -बड़े राज राजकुमार सीता स्वयंम्बर मे सहभागी के रूप मे पहुंचे जिसमे भगवान शिव के मानस पुत्र वाणा सुर, रावण दोनों भी गए थे किन्तु दोनों ही भगवान शिव के धनुष को प्रणाम किया और लौट गए भगवान शिव के भक्त मर्यादा पुरुषोत्तम भी भगवान शिव का धनुष भंग किया और सीता से 
विवाह किया!
रावण कि बहन सूप नखा द्वारा राम लक्ष्मण के समक्ष विवाह करने के प्रस्ताव व दबाव बनाने के बदले लखन ने सूप नखा का नाक कान काट दिया क्या यह न्यायोचित था? क्या यह नारी का अपमान नहीं है? धार्मिक सत्यार्थ के परिपेक्ष मे देखा जाय तो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने ऋषियों को असुर विहीन पृथ्वी करने कि प्रतिज्ञा किया था अपनी प्रतिज्ञा कि पूर्णता के लिए 
रावण को चुनौती देकर उसे युद्ध के लिए लालकरना ही उद्देश्य था 
मर्यादा पुरुषोत्तम होते हुए भी लघु भ्राता लक्ष्मण को नारी सूप नखा का नाक कान काटने का अमर्यादित आदेश दिया क्योंकि रावण को चुनौती देकर युद्ध भूमि मे उतारने का स्पष्ट अर्थ था उससे पूर्व पृथ्वी पर उसके बहुत बड़े असुर कुल का विनाश करना आवश्यक था जिसकी शुरुआत खर, दुशन, से होते हुए अहिरावण, मरीच, कालनेमी, कुम्भकर्ण, मेघनाथ सहित पूरा रावण का बहुत बड़ा कुटुंब था जिसके समापन के बाद ही रावण स्वंय युद्ध मे उतरा!
रावण का अंत मे विभीषण का कारक बनाना एक संयोग ही था 
सच्चाई रावण स्वंय जनता था उसके अंत का कारण उन महर्षि ऋषियों कि पीड़ा आंसू था जिनसे कर लेकर उनका रक्त घड़े मे एकत्र कर विदेह राज्य कि सीमा मे गाड़ दिया था जिससे सीता उसके कुल के विनाश का कारण बन कर जन्मी थी!
भगवान राम का अवतार असुर बिहीन पृथ्वी करने का संकल्प पृथ्वी से सीता का अवतरण हुआ!
 धर्म अधर्म सत्य असत्य यही था जिसके कारण ज्ञानी, महान पंडित उत्तम कुल मे जन्मा अनन्य शिव भक्त दस बार स्वंय का शीश भगवान शिव को अर्पण करने किया कैलास उठाया और सभी ग्रह नक्षत्र देवताओं को पराजित किया रावण बहुत बड़ा भविष्य वक्ता एवं अहंकारी था!
उसके द्वारा रचित रावण संघीता भरतीय ज्योतिष का दुर्लभ ग्रन्थ है!
वर्तमान समय और रावण कि तुलना गलत है रावण पराक्रमी विद्वान, और महान शिव भक्त था 
उत्तम कुल मे जन्मा असुर अवश्य 
था!!

नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर 
गोरखपुर 
उत्तर प्रदेश!!