Saturday, 8 August 2026

*"एक पेड़ मां के नाम" वृक्षारोपण अभियान पर पर्यावरणविद् डॉक्टर विनय कंसल ने किया वृक्षारोपण*

 *"एक पेड़ मां के नाम" वृक्षारोपण अभियान पर पर्यावरणविद् डॉक्टर विनय कंसल ने किया वृक्षारोपण*


*सारा सच (नई दिल्ली)* यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा मानसून के मौसम में देश की जनता से किए गए आवाह्न - *वृक्षारोपण केवल एक दायित्व नहीं बल्कि प्रकृति और संस्कारों का भी अभिन्न हिस्सा है* के अंतर्गत दिल्ली की मुख्य मंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता जी द्वारा दिल्ली की आम जनता से दिल्ली को स्वच्छ और हरा-भरा बनाने के लिए *मिशन 70 लाख पौधा रोपण अभियान* के अंतर्गत आज महर्षि दयानंद पार्क (नेपाल वाला बाग), कन्हैया नगर, त्रि नगर, दिल्ली में कन्हैया नगर आर डब्ल्यू ए ऑफ त्रि नगर (पंजीकृत), दिल्ली द्वारा एक विशाल वृक्षारोपण- *एक पेड़ मां के नाम* कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया।

इस अवसर पर सर्वश्रेष्ठ तिलक राम गुप्ता (विधायक), श्रीमती मंजू संजय शर्मा (पूर्व निगम पार्षद), डॉ विनय कंसल (पर्यावरणविद्), अनिल बंसल (प्रधान अग्रवाल समाज त्रि नगर), संजीव दुबे (अध्यक्ष कन्हैया नगर आर डब्ल्यू ए ऑफ त्रि नगर) सहित त्रि नगर क्षेत्र की विभिन्न सामाजिक संस्थाओं एवं संगठनों तथा विभिन्न आर डब्ल्यू ए के पदाधिकारी, स्कूल/ कॉलेज के विद्यार्थियों व अध्यापक-अध्यापिकाओं तथा डी डी ए के अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा 251 पौधे मोगरा एवं चमेली के लगाए गए।

*मुझे (प्रकृति) ना सोना चाहिए, ना ही चांदी चाहिए ।*
*मुझे तो केवल आपसे एक पेड़ चाहिए।।*

Friday, 7 August 2026

शीर्षक-ज़िन्दगी

                                                                               ग़ज़ल

शीर्षक-ज़िन्दगी

 ज़िंदगी की राह भी आसान होती जायगी। 
जान मेरी आपके कुर्बान होती जायगी‌।। 

साथ मेरे दो कदम चल के जि देखो जानजाॅ, 
नींद ऑंखों से तिरी अनजान होती जायगी।। 

डूब कर ऑंखों मि तेरी तरवतर हो जायगी, 
सच कहूँ तो ज़िंदगी  मुस्कान होती जायगी।। 

क्या बताएं हम किसी को दिल्लगी क्या चीज़ है, 
आशिकों से तुम पूछो हैरान होती जायगी।। 

दिल कि धड़कन में बसाया है तुम्हें हमने "कमल"
दिल लगा कर देख लो पहचान होती जायगी।। 

स्वरचित मौलिक अधिकार रचना
कमल धमीजा
फरीदाबाद -हरियाणा

।। जीवन की सीख।।


 ।। जीवन की सीख।।

था घना अंधेरा,
घोर घटा भी छाई थी।
पथ थी कहीं पथरीली,
कही गहरी खाई थी।।

भय भी हृदय में,
हिलोरे लेते ऊपर नीचे।
हम दोनों बढ़ चले,
निर्भय आंखें मीचे।।

पहली बार मृत्यु का,
देखा तांडव नर्तन।
हलक में अटकी थी प्राण,
करते मुख हरि कीर्तन।।

भूत प्रेत से ज्यादा,
दो टंगे दैत्य का भय था।
ऊपर बिजलियां भी डराती,
पथ पर जोखिम अतिशय था।।

मेघ अनवरत बरस रहे थे,
पथ पर बहती मानो गागर।
भय को बना साहस ,
बढ़ता गया मृत्यु के ऊपर।।

किंतु सवाल लक्ष्य का था,
सो निर्भय बढ़ चला।
गढ़ने भविष्य की इमारत,
मृत्यु से भी लड़ चला।।

जब मनुष्य लक्ष्य की ,
लेता है जिद्द ठान।
तब डिगा न पाता कंटक,
बाधा,आंधी या तुफान।।

हे रुप ! जीवन की सीख,
सतत यही अपना लेना।
शिव समान शांत प्रसन्न,
विषधर को भी मित्र बना लेना।

रचना:रुपेश कुमार मिश्र
ग्राम पोस्ट- भद्रेश्वर, वार्ड 06 , 
वाया- बथनाहा, प्रखंड - फारबिसगंज, 
जिला -अररिया , बिहार, पिन -854316 ,
 मोबाइल+ व्हाट्सएप्प - 09801546664, 08292600169
 Rupesh Kumar Mishra 
S/o- Shree Dinesh Mishra 
At post -Bhadreswar,ward 06,
Via - Bathnaha,block -Forbesganj
Dist -Araria, Bihar, pin -854316
Mo.09801546664,08292600169

*तुझे ज़िन्दगी बुला रही है*


 *तुझे ज़िन्दगी बुला रही है* 


तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही है।
गीत  खुशी के  सुना रही है।
सुख - दुख  के  दो  पाटो में,
सबको  झूला - झूला रही है।
      तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही है..

हँसाती ये कभी रुलाती भी,
सपने -सुहाने  दिखा रही है।
देखो - देखो  आँखे  खोलो, 
भोर  सुनहरी  जगा  रही है।
     तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही है...

सूरज   की  धवल  रश्मियां,
दिवस  नया  सजा  रही  हैं।
नव   कीर्ति  नई  परिभाषा,
जीना सबको सीखा रही है।
      तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही है...

उठ  चल   बंदे  बढ़ता  चल,
किस्मत साँकल बजा रही है।
हर  द्वारे  हर  देहरी  आँगन, 
फूल कुसुमित खिला रही है।
      तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही है...

कर्मगति  समझाती  'चन्द्रेश'
तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही  है
गीत  खुशी  के  सुना रही  है
ज़िन्दगी तुझको बुला रही है
     तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही है

चन्द्रकान्ता सिवाल 'चन्द्रेश'
(दिल्ली)
चन्द्रकान्ता सिवाल 'चन्द्रेश' 

सफलता की दौड़ में पीछे छूटती ज़िन्दगी

 

 सफलता की दौड़ में पीछे छूटती ज़िन्दगी

“अन्या, आज स्कूल में क्या हुआ?” माँ ने मोबाइल पर रील बदलते हुए पूछा।
“मैडम ने कहा था कि अपने माता-पिता के बारे में कुछ पंक्तियाँ लिखो,” अन्या ने धीमे स्वर में कहा।
पिता लैपटॉप पर काम करते हुए बोले, “अच्छा! सुनाओ, क्या लिखा?”
अन्या ने कॉपी खोली और पढ़ा—
“काश! पापा लैपटॉप से नज़र उठाकर मेरी बातें सुन पाते और माँ मोबाइल से ज़्यादा मुझे देख पाती।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
आज के माता-पिता बच्चों को हर सुविधा देकर उन्हें सफल और कामयाब बनाना चाहते हैं। लेकिन बेहतर भविष्य
बनाने की कोशिश में वे कई बार उनका वर्तमान देखना भूल जाते हैं। पिता काम में व्यस्त रहते हैं और माँ कुछ
पल आराम पाने के लिए मोबाइल की दुनिया में खो जाती है। बच्चा पास होकर भी अकेला और निराश महसूस
करता है।
बच्चों को केवल खिलौने, महँगे कपड़े या बड़ा विद्यालय नहीं चाहिए। उन्हें माता-पिता का समय, स्नेह और ध्यान
चाहिए। वे चाहते हैं कि कोई उनकी छोटी-सी बात सुने और उनके मन के हालात समझे।
ज़िन्दगी की सबसे बड़ी सीख यही है कि रिश्तों को सँभाले बिना प्राप्त सफलता अधूरी होती है। मुश्किल
परिस्थितियों से लड़ना आवश्यक है, पर अपनों की भावनाओं को अनदेखा करना उचित नहीं।
उस शाम पिता ने लैपटॉप बंद किया, माँ ने मोबाइल एक ओर रखा और दोनों अन्या के पास बैठ गए। पहली बार
उन्होंने केवल उसकी बातें नहीं सुनीं, बल्कि उसके मन का अकेलापन भी समझा।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा
हरियाणा