Friday, 8 May 2026

मजदूर - रंजना मलिक

 मजदूर - रंजना मलिक

                      बना  रहा  है  बड़ी  मेहनत  से
                           हर  दीवारों  को  मजदूर
                        सजा  रहा अपने  पसीने  की ,
                              एक  - एक  बूंदो  से
                        हर  एक  कंगूरों  को  मजदूर


                       अपने  श्रम  की हर  बूंदो  से
                    बनाता  है  नींव  मजबूत  मजदूर
                     ढ़ो - ढ़ो  कर वह हर  बोझों  को
               देता  शक्ति का परिचय  मजदूर


                    कड़ी  धूप  हो या  वर्षा में भी
                 थक कर  कभी  न  बैठा  मजदूर
                    अपनी  जीविका  चलाने को
                   किया  सुखद  परिश्रम मजदूर


                       हम  रहते  हैं   घरों  में
               सिर पे  हमारे  छत दिया  मजदूर
                     ख़ुद  बेघर  होकर  भी
                घरों  में  हमें  बसाता है मजदूर
          तुम्हारे  इसलिए  त्याग और श्रम  को
                  करते  हैं  हम  नमन  मजदूर   

 रंजना मलिक
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश )

मजदूर - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

मजदूर - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 
मनहरण घनाक्षरी 
मापनी 8-8-8-7

देश सेवा करते हैं, 
उम्मीद ही रखते हैं,
श्रमिक भाइयों पर,
हमें अभिमान है। 

झोपड़ी में रहते हैं, 
काम से न डरतें हैं,
ऐसे मजदूर भाई,
कौशलों की खान हैं। 

अभाव में रहते हैं, 
धूप-ताप सहते हैं, 
भारत समृद्ध रहे, 
यही अभियान है। 

समर्पण भाव लिये, 
काम के लिए ही जिये, 
उषा कहती ये भाई, 
सबसे महान हैं।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 
स्वरचित
वैस्ट बंगाल 

मजदूर - डा अनन्तराम चौबे अनन्त

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी 
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
मजदूर  - डा अनन्तराम चौबे अनन्त

पैदाइशी कोई मजदूर नही 
काम से मजदूर बना देते हैं ।
उनके मन में ये भावना 
भरकर मजदूर बना देते है  ।

फर्क सिर्फ इतना रहता है
मेहनत करके काम करते हैं ।
जहां भी काम मिल जाता है
उस घर में मजदूरी करते हैं ।

मजदूर से अधिक मेहनत 
किसान हमेशा करता है ।
खेतों में मिट्टी से हमेशा 
हर मौसम में जुड़ा रहता है।

सारा सच मजदूर से 
ज्यादा मेहनत  करता है ।
समय का कोई बंधन 
नही मजदूरी करता है ।

सुबह पांच वजे से
फसलों को पानी देता है ।
देर रात नौ दस वजे तक
खेतों में काम करता है ।

सारा सच मिट्टी में 
बैठकर खाना खाता है ।
नींद आ जाये तो
मिट्टी में सो जाता है ।

दाल रोटी खाकर ही
अपना पेट भर लेता है ।
समय पर जो खाना मिले
वही स्वादिष्ट भोजन होता है ।

मजदूर से भी ज्यादा किसान 
खेतों में मेहनत करता है ।
मजदूर तो फिर भी छांव में
बैठ आराम कर लेता है ।

सारा सच कभी धूप 
कभी छांव में रहता है ।
बस सात आठ घंटे 
ही काम करता है ।

मजदूर और किसान में
थोड़ा सा अन्तर रहता है ।
किसान काम अपने खेत में 
मजदूर कहीं भी काम करता है।

मजदूर को मजदूर का 
ठप्पा  लगा दिया है ।
उसको हीन भावना
से ग्रसित कर दिया है ।

सरकारी या गैर सरकारी 
सभी तो मजदूर होते है ।
अन्तर इतना है बस कुर्सी 
पर बैठकर काम करते है ।

नौकरी जो भी करता है
वो भी तो नौकर होते हैं ।
सरकारी या प्राइवेट हों
सभी नौकर ही होते हैं ।

मजदूर भी अब नही मिलते हैं
सरकार से राशन मुफ्त में लेते हैं ।
कहावत है मुफ्त में मिले खाने को 
तो फिर काहे जाए कमाने को ।

महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त 
 जबलपुर म प्र

माईं हमारी है अनमोल


माईं हमारी है अनमोल 
     इसका नही है कोई मोल।
     ईश्वर ने दिया अपना -
      स्वरूप है,
      सृष्टि कर किसी आत्मा
      की सम्पूर्ण इंसान बना-
       देती है।
       कर्तव्य और अधिकार-
       का ज्ञान देकर गुरू सम 
       बन जाती है।
       प्रथम गुरू का खिताब 
       पाती,
       शिशु,बालक व प्रौढ़ -
       अवस्था तक अपना 
       दायित्व निभाती।
       मां नही हमारी पराई है 
       इसके आंचल के तले
       जीवन हमारा स्वर्गीय -
       है।
      माईं हमारी है अनमोल,
     इसका नही है कोई मोल।

आसमान से - रशीद अकेला


 आसमान से - रशीद अकेला


टकराया हूँ हर आंधी और तूफ़ान से
ख़ौफ़ नहीं अब दरिया के उफान से

मुश्किल वक्त में अपने भी किनारा करते हैं
    आस लगा के देखा इस जहान से

ज़ख्म दिल के भरते नहीं कभी जानता हूँ
दर्द छुपाता हूँ फिर भी  झूठी मुस्कान से

     ख़ंजर से ज़्यादा ज़ख़्मी करते हैं
     निकलते हैं लफ्ज़ जो जुबान से

      होता है एहसास ईक दिन ज़रूर
      तीर छूट जाता है जब कमान से

उम्मीदें नहीं हौसला बचा के रखा हूँ मैं तो
  गुज़र जाऊँगा अब भी हर इम्तिहान से

   मेरी दरियादिली मुझे ले डूबी वरना
  कौन ? टकराता भला इस चट्टान से

    ये दर्द ओ ग़म क्या रुलाये मुझे
आँखे बस नम लेकर लौटा हूँ क़ब्रिस्तान से

आख़िर कब तक आज़माएगा मुझे वो रशीद
रहमत की बारिस होगी कभी तो आसमान से


रशीद अकेला ,झारखंड
लेखक एवं समाजसेवी