Thursday, 12 March 2026

सफर घूंघट से अंतरिक्ष तक - भगवती सक्सेना गौड़

सफर घूंघट से अंतरिक्ष तक - भगवती सक्सेना गौड़

पुरानी सदी थी, स्त्री घूंघट में थी। पर पर्दे में भी उसकी नजरें सदा खुली थी। समाज के बंदिशों का आदर सम्मान करते हुए सब सह लेती थी। हर ओर मतलब का संसार था।
चूल्हे की तपिश से जूझने के कशमकश के अलावा कोई चारा न था। वर्तमान सदी तक उसके ज्ञान चक्षु खुले और उसने अपने चारों ओर निगाहें डाली। 
एकाएक शिक्षा का प्रसार महिलाओं में हुआ, उसने जाना समझा, स्त्री को स्वतंत्रता तब ही मिलेगी जब वह भी शिक्षित होगी और सिर्फ शिक्षित ही नहीं, हर विद्या में पारंगत होगी। और उसे ईश्वर का और घर के पुरुषों का भी सहयोग मिला...। वह उन्नति के पायदानों पर शनैः शनैः बढ़ती चली गयी। आज *नारी* अपनी मंजिल के करीब ही है... डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, स्पेस इंजीनियर, मार्केटिंग हेड, आईटी मैनेजर, प्रोफेसर, राइटर और बहुत कुछ बन चुकी है। कहाँ तक गिनाए, कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा वह तो आकाश तक पहुँच पायलट भी बन चुकी है। इसके बावजूद *नारी* पास ममता का आँचल भी है, बुजुर्गों के लिए सहानुभूति भी है। अब वह पन्नों पर तो लिखती ही है, पर उसकी रचनाएं आकाश तक गुंजायमान होती हैं। आज की *नारी* सृजन और शक्ति का बेजोड़ नमूना है, मेरा भी शत शत प्रणाम है !!

स्वरचित
भगवती सक्सेना गौड़
Karnataka 

No comments:

Post a Comment