Monday, 27 April 2026

न्याय - डा अनन्तराम चौबे अनन्त

राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी 
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
विषय.... न्याय 
नाम.. महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर 
कविता... न्याय 

न्याय, कानून, कोर्ट, फैसला,
वकील बीच में इसके रहते है ।
अन्याय जहां जब भी होता है
न्याय पाने को कोर्ट जाते है ।

कोर्ट कचहरी और थाने में
न्याय मांगने सब जाते हैं ।
न्याय अन्याय के चक्कर में
दोनों पक्ष यहां पर जाते हैं।

न्याय अन्याय के फैसले में
कानून से फैसला होता है ।
वकील कोर्ट में जिरह करते है
गवाह और साक्ष्य रखते हैं ।

अपराधी मामले पुलिस देखती
जांच के वाद रिपोर्ट को लिखती ।
चार्ज सीट जब कोर्ट में जाती
सुनवाई केश की तब है होती ।

कानून तो बस अंधा होता है
साक्ष्य और गवाह मांगता है ।
सच को झूठ और झूठ को सच
वकीलों की जिरह से होता है ।

न्याय पाने के चक्कर में कोर्ट में
दस बीस साल गुजर जाते हैं ।
तारीख पर तारीख कोर्ट से मिलती
समय और पैसा बरवाद होते हैं ।

वकीलों की रोजी रोटी चलती है
हर पेशी में फीस जो मिलती है ।
वकीलों का काम जिरह करना है
मानवता वहां तार तार होती है ।

अपराध और दुष्कर्म के मामले में
महिलाओं की इज्जत लुटती है ।
न्याय को पाने कोर्ट जो जाता
उसकी भी इज्जत लुट जाती है ।

न्याय कानून कोर्ट के फैसले
वकीलों के माध्यम से चलते हैं ।
सारा सच न्याय मिले या न मिले
जीवन तो बर्बाद हो जाते हैं  ।

न्यायालय है न्याय का मंदिर
न्याय पता नहीं कब होता है।
किसको न्याय कब मिलता है
समय का न कुछ पता होता है ।

माध्यम वकील न्याय में होते
जो अपना धंधा करते हैं ।
सारा सच वादी, प्रतिवादी के 
पक्ष में वकील खड़े रहते हैं ।

कौन सच्चा और कौन झूठा है
पक्ष दोनों अपना रखते हैं ।
दोनों जीत का वादा करते
मन मानी फीस जो लेते हैं ।

गारंटी नहीं किसी केश की
हार जीत कब किसकी होगी ।
वकील फीस अपनी लेते हैं
अगली तारीख बढ़ा लेते हैं 

सारा सच फैसले की गारंटी नहीं 
तारीख पर तारीख ही मिलती है ।
दस बीस साल केश चलते हैं
खर्च की कोई सीमा नहीं होती है ।

सरकार यूजीसी कानून बनाया 
सवर्ण बच्चों पर अन्याय किया है ।
देश में यूजीसी का विरोध हो रहा है 
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाया है ।

न्याय कब होगा पता नहीं है
तारीख पर तारीख बढ़ा रही है ।
आरक्षण एस सी एस टी एक्ट 
यूजीसी कानून से मुसीबत बढ़ रही है ।

   महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
    जबलपुर म प्र/

शांति - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

शांति - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 

वह इंसान बहुत भाग्यशाली है,
जिसके जीवन में शांति है। 
वरना आजकल तो चारों ओर, दिखती केवल अशांति है।
शांति पाने के लिए,
हम जीवन भर मेहनत करते हैं।
पर अधिकांश लोग जीवन भर, शांति से दूर ही रहते हैं।
आज देश में अधिकांश जगह, अशांति ही दिखती है। 
विद्रोह की बातें, हमें ज्यादा सुनने को मिलती हैं।
अशांति कभी अच्छी नहीं होती,  चाहे घर हो, परिवार, देश या संसार।
हम अपने कर्तव्य पर कम ध्यान देते हैं, 
मांगते हैं तो केवल अपना अधिकार।
शांति हमें प्यारी होती, 
पर हमारे पास यह नहीं टिकती।
शांति के लिए हमें ही प्रयास करना होगा, यह बाजार में नहीं बिकती।
मतभेद हो सकता है, उसको देना नहीं तूल।
सबसे प्यार से बातें करना, उनकी गलती जाना भूल।
शांति से अपनी बात कहना, 
शांति से औरों की सुनना।
अशांत वातावरण में, 
अपने पैर क्यों रखना?
मन की शांति के लिए, स्वस्थ तन होगा रखना।
'ढाक के तीन पात' बने रहने से अच्छा है, खुद को बदलना।
विश्व शांति दिवस 21 सितंबर को मनाया जाता है। 
शांति जीवन में हो, मानव आगे बढ़ता जाता है।
सफेद कबूतर को, शांति का प्रतीक माना जाता है। 
शांत मन ऊर्जा से भरा रहता,  यही बताया जाता है।
मन यदि शांत हो, हम निर्णय ले पाते हैं सही। 
मन यदि अशांत हो, किसी
कार्य में मन लगता नहीं।
हम भारतवासी, 'जियो और जीने दो' में विश्वास करते हैं। 
भारत एक शांतिप्रिय देश है, ऐसा संसार के लोग कहते हैं।
शांति के लिए यदि थोड़ा झुकना पड़े, झुक जाना जरूर।
ऐसा अहंकार किस काम का, जो तुमको अपनों से ही कर दे दूर।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' स्वरचित

डॉ पी सी कौंडल - डॉ पी सी कौंडल

                                                    डॉ पी सी कौंडल - डॉ पी सी कौंडल

       महिला का न केवल भारत बल्कि समूचे विश्व भर में विशेष स्थान रहा है। महिला मां है, बहन है, बेटी है, पत्नी है। क्या महिला के बिना मानव संसार की कल्पना की जा सकती है? महिला के बिना मानव रचना असम्भव है। महिला ही बच्चे को जन्म दे सकती है। वह बच्चे को जन्म ही नहीं देती,अपितु उसका पालन पोषण भी करती है और अपनी सारी ममता उस बच्चे पर न्योछावर कर देती है। बच्चा भले ही बेटा हो या बेटी, वह तो महिला(मां)  के कलेजे का टुकड़ा होता है। बच्चों की देख रेख के अतिरिक्त महिला अपने पति, सास ससुर की सेवा भी करती है और अपने माता पिता की देख रेख भी करती है। महिला का घर गृहस्थी और समाज में बहुत बड़ा योगदान रहता है। घर का सारा काम काज वह स्वयं करती है। घर में आए मेहमानों के मान सम्मान में भी वह कोई कमी नहीं छोड़ती।  फिर महिला को पुरुषों से कम क्यों आंका जाता है? आज महिला पुरुषों से बहुत आगे निकल चुकी है 
इतिहास साक्षी है;
       अति बहादुर रही झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, देश की राष्ट्रपति रही श्रीमती प्रतिभा पाटिल जी, प्रधानमंत्री रही श्रीमती इंदिरा गांधी जी, नेशनल कांग्रेस पार्टी चीफ रही श्रीमती सोनिया गांधी जी, लोकसभा अध्यक्ष रही श्रीमती मीरा कुमार जी तथा केंद्रीय मंत्रिमंडल, राज्य सभा, विधान सभाओं में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर आसीन रहीं अनेक महिलाओं के नाम उल्लेखनीय हैं, फिर महिला को समाज के हर क्षेत्र में पुरुषों के समान अधिकार क्यों नहीं दिए जाते? उसे कमजोर क्यों समझा जाता है? 
         मेरे विचार से हर क्षेत्र में महिला को पचास प्रतिशत की हकदारी के अधिकार प्राप्त होने ही चाहिए। जमीन जायदाद में भी पुरुष के नाम के साथ महिला( पत्नी) का नाम भी अवश्य जुड़ना चाहिए ताकि पुरुष( पति) और महिला( पत्नी) दोनों एक दूसरे के पूरक बन पाएं। महिला के बिना पुरुष अधूरा है और पुरुष के बिना महिला भी अधूरी है। एक दूसरे के बिना दोनों का कोई अस्तित्व नहीं है 
      युगों युगों से महिला इस पुरुष प्रधान समाज में अनेकों प्रकार के दुःख झेलती चली आ रही है। उसे पुरुषों के समान पूरे अधिकार देने होंगे ताकि एक स्वस्थ और खुशहाल समाज की परिकल्पना की जा सके।

डॉ पी सी कौंडल, हिमाचल प्रदेश

महिला आरक्षण बिल - Dr. Pro. Y. Kasturi Bai

महिला आरक्षण बिल - Dr. Pro. Y. Kasturi Bai 
महिला आरक्षण बिल
सिर्फ कागज़ की स्याही नहीं,
यह वर्षों की चुप्पी का उत्तर है—
जब संसद के गलियारों में
आवाज़ें थीं, पर आधी अधूरी।

समानता का अर्थ
सिर्फ बराबरी का शब्द नहीं,
यह उस बेटी की मुस्कान है
जो स्कूल से लौटकर कहती है—
“माँ, अब मैं भी नेता बन सकती हूँ,”
और उसकी आँखों में
नए सपनों का उजाला जगता है।

न्याय तब होता है
जब रसोई और संसद के बीच
दीवारें गिरती हैं,
और भागीदारी तब जन्म लेती है
जब हाथ सिर्फ चूल्हे तक सीमित नहीं रहते,
बल्कि निर्णयों की मेज तक पहुँचते हैं।

अधिकार कोई दान नहीं,
यह जन्मसिद्ध धड़कन है—
जैसे खेत में काम करती वह स्त्री
जिसने कभी अपना नाम वोटर सूची में नहीं देखा,
अब अपनी पहचान खुद लिखती है,
और अपने बच्चों को
समान भविष्य का सपना दिखाती है।

विकास का चेहरा तब सुंदर होता है
जब उसमें हर रंग शामिल हो,
जब पंचायत की चौपाल से लेकर
संसद के ऊँचे मंच तक
महिलाओं की उपस्थिति
सिर्फ संख्या नहीं, शक्ति बनती है।

यह आरक्षण
कमज़ोरी की बैसाखी नहीं,
बल्कि अवसर का द्वार है—
जहाँ अनुभवहीन हाथ भी
नए इतिहास गढ़ सकते हैं,
और समाज को नई दिशा दे सकते हैं।

और तब समाज स्वस्थ होगा,
जब सम्मान किसी एक का विशेषाधिकार नहीं,
बल्कि हर स्त्री की स्वाभाविक पहचान होगा—
जहाँ वह सिर उठाकर कह सके,
“मैं भी इस देश की दिशा हूँ।”
Dr. Pro.  Y. Kasturi Bai 
Bengaluru 
Karnataka

तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें - रशीद अकेला


तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें - रशीद अकेला 

तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें …..दूँगा*

शिक्षा स्वास्थ्य  हर क्षेत्र में व्यापारी दूँगा 
तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें बेरोजगारी दूँगा

लड़ रहे बरसों से अत्याचार भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़
तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें भ्रष्टाचारी दूँगा 

सत्ता के गुणगान में भौंकेगी मीडिया
तुम मुझे वोट दो मैं उन्हें दलाली दूँगा

सबके लोन माफ किसान देश के जवान साफ़ 
तुम मुझे वोट दो  मैं तुम्हें ऐसी खुशहाली दूँगा

अनपढ़ ज़ाहिल गँवार अंधभक्त देश का मुक़द्दर 
तुम मुझे वोट मैं तुम्हें शासन में दुराचारी दूँगा

सब खाके सबको खाके भी ना मारे ढकार 
तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें राष्ट्रीय भिखारी दूँगा 

द्रोपदी क्या बचाएगी अपनी इज़्ज़त रशीद
तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें बलात्कारी दूँगा

रशीद अकेला , झारखंड 
लेखक एवं समाजसेवी

मैं अकेला राही हूं - उमेश नाग

मैं अकेला राही हूं - उमेश नाग

मैं अकेला राही हूं,
चला हूं अकेला।
अनजानी राहें हैं,
पूछती हैं मेरा पता।
अलबेला हूं मस्त हूं,
 फिक्र नहीं किसी की करता हूं।
 अपनी ही दुनिया में व्यस्त   रहता हूं,
  नही किसी और की यादें,
  न ही किसी को भूला बैठा   हूं।
  अकेले होने के पल गुजारें,
   मायूसी के आलम का दर्द   भी सहा।
   तुम तो बेवफा बनें हो,
   अकेला हमें छोड़ दिया है।
    मगर हम तो खुशमिजाज      हैं प्रिय,
     अकेला तो क्या हर हाल 
    में मस्त व दिवाने रहते हैं।
                       श्रीमती उमेश नाग जयपुर राजस्थान

Tuesday, 21 April 2026

बर्बादी - सपना

 
 बर्बादी - सपना 

बर्बादी यूँ ही नहीं उतरती जीवन में,
यह धीरे-धीरे पनपती है,
चुपके से दिल में घर करती है,
और फिर सब कुछ अपना सा लगता है उसे।

कभी यह सपनों की राख बनकर आती है,
तो कभी उम्मीदों की लौ बुझा जाती है,
चेहरे पर मुस्कान रहती है,
पर भीतर से इंसान टूट जाता है।

बर्बादी सिर्फ खोने का नाम नहीं,
यह खुद को भूल जाने की कहानी है,
जहाँ इंसान आईने में खुद को ढूँढता है,
पर पहचान कहीं खो चुकी होती है।

रिश्ते भी तब पराये लगने लगते हैं,
जब विश्वास की डोर कमजोर हो जाए,
और शब्दों की गर्माहट भी,
दिल के ठंडेपन को पिघला न पाए।

पर हर बर्बादी के बाद एक सवेरा भी होता है,
जो सिखाता है फिर से जीना,
राख से उठकर फिर खड़ा होना,
और खुद को फिर से पाना।

बर्बादी अंत नहीं है जीवन का,
यह एक कठिन मोड़ भर है,
जो संभल गया वो जीत गया,
वरना यही मोड़ सबसे बड़ा सबक है। 


परिचय
नाम - सपना 

युद्ध - डॉ निर्मल सूद

युद्ध - डॉ निर्मल सूद
 
सुना आपने हवाओं को?
मैंने सुनी उनकी सिसकियाँ
सुबकती हवाओं का रूदन
उनके स्पर्श का गीलापन
आँसुओं से भीगी-भीगी 
कहाँ से आई हो तुम ?
युद्ध भूमि से जहाँ हो रहा नरसंहार..।
जहाँ मिट्टी में इन्सानी लहू मिला है,
बच्चों का क्रंदन, पुरुषों की चीत्कार,
औरतों की पीड़ा सनी चीखें
अनायास सब कुछ बदल गया
 जीवन भर का संग्रह पूँजी,
 घर, रिश्ते,सपने सब लूट गया
रह गये सिर्फ़ घाव उनसे बहता 
दर्द का रिसाव,
कितना हिंसक है मनुष्य ताक़त
शासन, सत्ता , दौलत की हवस
छीन लेती है इन्सानियत,
ह्रदयहीन पत्थर सा मनोवेगों
संवेदनाओं से विहीन निष्ठुर
ओह! कितना वीभत्स घिनौना 
भयावह , अपने और अपनों 
के प्राण बचा कर अन्धाधुँध
भागते लोग , गोलियाँ बारूद
धुँआ-धुँआ शहर , छूटते हाथ
अपनों का साथ दिल दहलाता
 मंजर ….
 साहसी निडर योद्धा पुरूष
औरतें हथियार उठा सिर मुँह
बाँध अपने वतन और अपनों के
जीवन के लिए जंग लड़ते, 
मरते, मिटते लोग 
सत्ता के मोहरे जो बिछे हैं
युद्ध की बिसात पर,
 अपनी रूह और जिस्म की
सिलवटों को सहेजती औरतें
परिवार के अवशेष बटोरती
बदहवास,
कौन है सूत्रधार इनके जीवन का
दोनों पक्षों के सत्ताधारियों का
विध्वंसक खेल
इतना विनाश महाकाल का तांडव ,हाहाकार,
चारों तरफ बिखरे मानव अंग
कटी भुजाएं कबंध,
मानवता का इतना ह्रास.. विनाश
यह सब देख कर भी नहीं होती
शमित प्यास,
शासकों की “मैं “की तुष्टि का यह परिणाम ,
फिर भी कहाँ पसीजते इनके पाषाण हृदय,
लोग इनके लिए सिर्फ़ गणना मात्र से न इतर,
काश युद्ध की विभीषिका का ताप पहुँचे इन तक,
नहीं होते युद्ध के परिणाम श्रेयस्कर ….
 फिर से अमन-प्रेम के फूल खिलें,
जो बिछुड़े हैं ज़लज़ले में नियति से फिर मिलें,
ए हवाओ!सुनो तुम ले जाओ
हमारा संदेश,
कहना हम भी हैं साथ तुम्हारे 
फ़िज़ा में जंहा आज बिखरा है
ग़म उदासी ,
कल ख़ुशियों की बहारें होंगी
सबके अपने घर होंगे छत पर
परिंदों की क़तारें होंगी,
टूटे घरों की दरारों व घायल मन 
के बीच पुनः आस हरी होगी
ले जाओ मेरा स्नेहिल स्पर्श 
उनके घावों को हल्के से छू लेना,
तुम भी बहना संभल कर ज़रा
हो सके जितना उन्हे सुकून देना।

    डॉ निर्मल सूद
चण्डीगढ़ 

युद्ध विकल्प कैसे हो सकता है - डाँ० योगेश सिंह धाकरे "चातक"

युद्ध विकल्प कैसे हो सकता है - डाँ० योगेश सिंह धाकरे "चातक" 

इन नेताओं की 'महत्वाकांक्षा' और 'जिद' शायद मानवीय संवेदनाओं से बड़ी हो चुकी है। 

!! "युद्ध विकल्प कैसे हो सकता है" !!
————————————————

वसुधा' धन धान्य दाता के रूप मैं ।
मानव के भाग्य विधाता के रूप मैं ।
धरा" धरती" मेदिनी, नाम हैं इसके,
सभी निवासी, बेटे समान हैं इसके ।

वसुधा भगवान ने दी है, रहने के लिये,
ना कि वर्चस्व की आग मे जलने के लिये ।
वसुधा पर खिची तमाम सरहदें बेमानी है,
जब दिलो मे जगह ओर आँखो मे पानी है ।

मानव ही दानव बन इसे उजाड़ने मे लगा है ।
धरा का धैर्य टूटा तो मानव होना ही सजा है ।

मत लो परीक्षा, ईश्वर के साथ प्रकृति की ।
कर लो रे सम्मान, धैर्य धारिता पृथ्वी की ।

युद्ध विकल्प क्यों हो गया है..समस्या का ।
क्या र्निबल को अधिकार नही है,रक्षा का ।

युद्ध की परिणीती तो,भयावह होती है ।
वही तो, कुरुक्षेत्र का कथानक होती है ।

युद्ध आज तक कोई जीता है
एकमात्र जनता ही हारती है ।
सब कुछ लुटा करके बेचारी,
लाशें भी नही समेंट पाती है ।।

———————————————
स्वरचित.......
डाँ० योगेश सिंह धाकरे "चातक"
{ ओज कवि } आलीराजपुर म.प्र

धोखा - डा अनन्तराम चौबे अनन्त


                                                     राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी की 

साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु
विषय...  धोखा
नाम.. महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर म प्र
कविता...धोखा 

झूठ, फरेब, धोखा करना 
इसका  ही बोलबाला है ।
सच्चाई का नही जमाना
ये कैसा समय निराला है ।

सच की राह पर जो चलता है 
दर दर की ठोकरें वो खाता है ।
जीत अंत में सच्चाई की होती
मुश्किल भरा जीवन होता है ।

सभी सरकारी आफिसों हैं
बस भ्रष्टाचार फैला हुआ है ।
छोटा बड़ा कोई भी काम हो
भ्रष्टाचार का जाल बिछा है ।

झूठे फरेबी धोखेबाज लोग 
सभी काम धोखा से करते हैं ।
लोगों से लाखों रुपया लेकर
शहर छोड़कर भाग जाते हैं ।

अपना स्वार्थ सिद्धि करने में
हर ऐसा इन्सान लगा हुआ है ।
झूठ का बोलबाला रहता है
मन में फितूर ऐसा भरा हुआ है ।

सारा सच धोखा देकर ही 
बच्चों का अपहरण करते हैं ।
माता पिता से फिरौती की
रकम मांगते झूठ बोलते हैं ।

कुछ बेटे बहू ऐसे भी हैं
माता पिता को धोखा देते हैं ।
घर जमीन अपने नाम लिखाकर
माता पिता को वृद्धाश्रम छोड़ देते हैं।

झूठ फरेब और मक्कारी है
सारा सच झूठ का बोलबाला है ।
इन्सान के मन में धोखा बसा है
पर दिखने में भोला भाला है ।

सच और झूठ की दो राहें हैं
सच की राह सफल बनाती है ।
सच की राह  कठिन होती है
कदम कदम पर ठोकर लगती है ।

झूठ फरेब धोखेबाज हमेशा
ऐशो आराम से ही रहते हैं ।
लोगों को उल्लू बनाकर ही
हरदम फलते फूलते रहते हैं ।

अदालत कोर्ट कानून जहां है
सारा सच झूठ के आदेश वही हैं ।
गुनाहगार बेगुनाही के फैसले
अक्सर ही  रोज वहीं होते है ।

जज के सामने बाबू बैठकर
पेशी वालों से रुपया लेते रहते है।
ऐसे भ्रष्टाचार और धोखे को
क्या जज देख नही पाते हैं ।

वर्तमान में परिवेश में न्याय की
दिशा दशा दोनों ही खराब हैं ।
न्याय के नाम पर लड़ो लड़ाई
न्याय का मिलना एक ख्वाब है ।

कोर्ट कचहरी और अदालत
कानून के ही ये रखवाले हैं ।
बेगुनाह और गुनाहगारों के
सच झूठ के होते फैसले हैं ।

कौन सच्चा और कौन झूठा है
अदालत कोर्ट ही तय करते हैं ।
अंधे कानून के मायाजाल में
सच और झूठ के फैसले होते हैं ।

गुनाहगार बेगुनाह गारों के फैसले
अदालत कोर्ट के आदेश से होते हैं ।
गवाहों और वकीलों की दलीलें से
सारा सच क्या है पर आदेश होते हैं ।

कोर्ट कचहरी अदालतों में बस
न्याय को पाने की मुश्किल होती है ।
वकीलों की महंगी फीस होती है
कोर्ट से तारीख पर तारीख मिलती है।

कोर्ट का सच झूठ कोर्ट ही जाने
सारा सच क्या है समझ न आये ।
बेगुनाह और गुनाहगारों के कोर्ट 
के आदेश पर अंगुली कौन उठाये ।

सारा सच कोर्ट कचहरी कानून 
 से देश में  सभी दुखी रहते हैं ।
न्याय पाने की उम्मीद से ही
मजबूरी में अदालत जाते हैं ।

न्याय अन्याय तो कोर्ट ही जाने
पर प्रश्न खड़े तो होते ही हैं ।
निर्णय के खिलाफ कौन बोले
विरोध करने से सभी डरते हैं ।

महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
   जबलपुर म प्र

विश्वयुद्ध - डॉ पी सी कौंडल

 

विश्वयुद्ध - डॉ पी सी कौंडल

विश्वयुद्ध का खतरा सिर पर मंडरा रहा
ईरान इजरायल में छिड़ा युद्ध ये सब बटला रहा।

अमेरिका ईरान को बार बार धमका रहा
रोनाल्ड ट्रंप विश्व में अपना नाम चमका रहा।

उधर रशिया भी अपनी टांग अड़ा रहा 
महीनों से चला यह युद्ध खत्म होने में नहीं आ रहा।

गोलियां, मिसाइलें दागने से ईरान बाज नहीं आ रहा।
भारत दोनों देशों को शान्ति का पाठ पढ़ा रहा।

विश्वयुद्ध के नाम से सब देशों को भरमा रहा
जेट विमानों के जरिए गोलियां बरसा रहा।

कभी भारत पाकिस्तान में कड़वापन आ रहा 
कभी चीन भी बड़ी बड़ी आँखें दिखा रहा।

रात दिन ये महायुद्ध चलता ही जा रहा 
रातों को भी खून की नदियां बहा रहा।

माताओं,बहनों,बच्चों का अकारण खून बहता जा रहा।
इन हालातों को देख विश्वयुद्ध नजदीक आ रहा।

विश्वयुद्ध अगर हुआ तो दुनियां का नामोनिशान मिट जाएगा 
तब संपूर्ण ब्रह्मांड में अंधकार छा जाएगा।

लगता नहीं दोनों देशों के बीच शीशफायर हो पाएगा
शीशफायर अगर हो गया तो अमन चैन हो जाएगा।

डॉ पी सी कौंडल, वरिष्ठ साहित्यकार, हिमाचल प्रदेश,

युद्ध - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी


 युद्ध - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी

युद्ध से किसी का भला नहीं होता, केवल विनाश होता है।
आर्थिक मंदी होती, अपनों को मानव खोता है।
युद्ध जिसने भी किया, 
खुद भी हो गया तबाह।
जीवन दुख से भर जाता, 
मुख से बस निकलती आह।
जंग से कुछ हासिल न होता, 
विकाश की गति ठप होती।
दिल से दिल की दूरी बढ़ती,
नफरत के बीज यह बोती।
युद्ध की विभिषिका, बस कहर ही ढाती है।
अमन की है दुश्मन यह, 
केवल उत्पात मचाती है।
युद्ध जब भी होता है, 
भयंकर होता है परिणाम।
निर्दोषों की जान जाती, 
पीड़ादाई होता अंजाम।
ऐसी तबाही मचाती, भरपाई मुश्किल होता।
जीत चाहे जिसे मिले, नुकसान दोनों पक्षों का होता।
जान-माल की हानि होती,  
शांति मन की छिन जाती।
आर्थिक संकट छा जाता,
खुशी कहीं न दिख पाती।
इतिहास गवाह है, युद्ध से केवल बर्बादी होती है।
पर्यावरण दूषित होता, अपनों से जुदाई होती है। 
मासूमों की जान जाती, 
घर से बेघर होते लोग।
नकारात्मकता फैल जाती,
धर दबोचता कई रोग।
युद्ध टाला जा सकता है, 
थोड़ी कोशिश करनी होगी। 
थोड़ा अभिमान तजना होगा,
कुछ विपक्ष की सुननी होगी।
युद्ध से बचने के लिए, 
स्थापित करना होगा संवाद।
खुद पर नियंत्रण रखना होगा, नहीं करना फालतू वाद-विवाद।
प्रतिशोध की भावना त्यागो,
कोशिश करो, युद्ध को टालो।
अपनी बात कहो जरूर, पर औरों की सुनने की आदत डालो।
हथियार का उपयोग नहीं करना, 
नियंत्रण रखना होगा खुद पर। 
दुश्मन को भी गले लगाओ, दोनों हाथ बढ़ाकर।
बातचीत करो, आपस में सहमति बनाओ।
गलतफहमियां दूर करो, शांति की अहमियत बताओ।
कोई ऐसी समस्या नहीं, 
जिसका समाधान नहीं। 
हर युद्ध रोका जा सकता है, 
अपनी तरफ से पहल करो तो सही।
वादा करो तुम स्वयं से, युद्ध की नौबत न आने दोगे।
दिल से दिल की दूरी कम कर,
रिपु को गले लगा लोगे।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
स्वरचित
वैस्ट बंगाल