युद्ध - डॉ निर्मल सूद
सुना आपने हवाओं को?
मैंने सुनी उनकी सिसकियाँ
सुबकती हवाओं का रूदन
उनके स्पर्श का गीलापन
आँसुओं से भीगी-भीगी
कहाँ से आई हो तुम ?
युद्ध भूमि से जहाँ हो रहा नरसंहार..।
जहाँ मिट्टी में इन्सानी लहू मिला है,
बच्चों का क्रंदन, पुरुषों की चीत्कार,
औरतों की पीड़ा सनी चीखें
अनायास सब कुछ बदल गया
जीवन भर का संग्रह पूँजी,
घर, रिश्ते,सपने सब लूट गया
रह गये सिर्फ़ घाव उनसे बहता
दर्द का रिसाव,
कितना हिंसक है मनुष्य ताक़त
शासन, सत्ता , दौलत की हवस
छीन लेती है इन्सानियत,
ह्रदयहीन पत्थर सा मनोवेगों
संवेदनाओं से विहीन निष्ठुर
ओह! कितना वीभत्स घिनौना
भयावह , अपने और अपनों
के प्राण बचा कर अन्धाधुँध
भागते लोग , गोलियाँ बारूद
धुँआ-धुँआ शहर , छूटते हाथ
अपनों का साथ दिल दहलाता
मंजर ….
साहसी निडर योद्धा पुरूष
औरतें हथियार उठा सिर मुँह
बाँध अपने वतन और अपनों के
जीवन के लिए जंग लड़ते,
मरते, मिटते लोग
सत्ता के मोहरे जो बिछे हैं
युद्ध की बिसात पर,
अपनी रूह और जिस्म की
सिलवटों को सहेजती औरतें
परिवार के अवशेष बटोरती
बदहवास,
कौन है सूत्रधार इनके जीवन का
दोनों पक्षों के सत्ताधारियों का
विध्वंसक खेल
इतना विनाश महाकाल का तांडव ,हाहाकार,
चारों तरफ बिखरे मानव अंग
कटी भुजाएं कबंध,
मानवता का इतना ह्रास.. विनाश
यह सब देख कर भी नहीं होती
शमित प्यास,
शासकों की “मैं “की तुष्टि का यह परिणाम ,
फिर भी कहाँ पसीजते इनके पाषाण हृदय,
लोग इनके लिए सिर्फ़ गणना मात्र से न इतर,
काश युद्ध की विभीषिका का ताप पहुँचे इन तक,
नहीं होते युद्ध के परिणाम श्रेयस्कर ….
फिर से अमन-प्रेम के फूल खिलें,
जो बिछुड़े हैं ज़लज़ले में नियति से फिर मिलें,
ए हवाओ!सुनो तुम ले जाओ
हमारा संदेश,
कहना हम भी हैं साथ तुम्हारे
फ़िज़ा में जंहा आज बिखरा है
ग़म उदासी ,
कल ख़ुशियों की बहारें होंगी
सबके अपने घर होंगे छत पर
परिंदों की क़तारें होंगी,
टूटे घरों की दरारों व घायल मन
के बीच पुनः आस हरी होगी
ले जाओ मेरा स्नेहिल स्पर्श
उनके घावों को हल्के से छू लेना,
तुम भी बहना संभल कर ज़रा
हो सके जितना उन्हे सुकून देना।
डॉ निर्मल सूद
चण्डीगढ़

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