युद्ध विकल्प कैसे हो सकता है - डाँ० योगेश सिंह धाकरे "चातक"
इन नेताओं की 'महत्वाकांक्षा' और 'जिद' शायद मानवीय संवेदनाओं से बड़ी हो चुकी है।
!! "युद्ध विकल्प कैसे हो सकता है" !!
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वसुधा' धन धान्य दाता के रूप मैं ।
मानव के भाग्य विधाता के रूप मैं ।
धरा" धरती" मेदिनी, नाम हैं इसके,
सभी निवासी, बेटे समान हैं इसके ।
वसुधा भगवान ने दी है, रहने के लिये,
ना कि वर्चस्व की आग मे जलने के लिये ।
वसुधा पर खिची तमाम सरहदें बेमानी है,
जब दिलो मे जगह ओर आँखो मे पानी है ।
मानव ही दानव बन इसे उजाड़ने मे लगा है ।
धरा का धैर्य टूटा तो मानव होना ही सजा है ।
मत लो परीक्षा, ईश्वर के साथ प्रकृति की ।
कर लो रे सम्मान, धैर्य धारिता पृथ्वी की ।
युद्ध विकल्प क्यों हो गया है..समस्या का ।
क्या र्निबल को अधिकार नही है,रक्षा का ।
युद्ध की परिणीती तो,भयावह होती है ।
वही तो, कुरुक्षेत्र का कथानक होती है ।
युद्ध आज तक कोई जीता है
एकमात्र जनता ही हारती है ।
सब कुछ लुटा करके बेचारी,
लाशें भी नही समेंट पाती है ।।
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स्वरचित.......
डाँ० योगेश सिंह धाकरे "चातक"
{ ओज कवि } आलीराजपुर म.प्र

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