डॉ पी सी कौंडल - डॉ पी सी कौंडल
महिला का न केवल भारत बल्कि समूचे विश्व भर में विशेष स्थान रहा है। महिला मां है, बहन है, बेटी है, पत्नी है। क्या महिला के बिना मानव संसार की कल्पना की जा सकती है? महिला के बिना मानव रचना असम्भव है। महिला ही बच्चे को जन्म दे सकती है। वह बच्चे को जन्म ही नहीं देती,अपितु उसका पालन पोषण भी करती है और अपनी सारी ममता उस बच्चे पर न्योछावर कर देती है। बच्चा भले ही बेटा हो या बेटी, वह तो महिला(मां) के कलेजे का टुकड़ा होता है। बच्चों की देख रेख के अतिरिक्त महिला अपने पति, सास ससुर की सेवा भी करती है और अपने माता पिता की देख रेख भी करती है। महिला का घर गृहस्थी और समाज में बहुत बड़ा योगदान रहता है। घर का सारा काम काज वह स्वयं करती है। घर में आए मेहमानों के मान सम्मान में भी वह कोई कमी नहीं छोड़ती। फिर महिला को पुरुषों से कम क्यों आंका जाता है? आज महिला पुरुषों से बहुत आगे निकल चुकी है
इतिहास साक्षी है;
अति बहादुर रही झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, देश की राष्ट्रपति रही श्रीमती प्रतिभा पाटिल जी, प्रधानमंत्री रही श्रीमती इंदिरा गांधी जी, नेशनल कांग्रेस पार्टी चीफ रही श्रीमती सोनिया गांधी जी, लोकसभा अध्यक्ष रही श्रीमती मीरा कुमार जी तथा केंद्रीय मंत्रिमंडल, राज्य सभा, विधान सभाओं में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर आसीन रहीं अनेक महिलाओं के नाम उल्लेखनीय हैं, फिर महिला को समाज के हर क्षेत्र में पुरुषों के समान अधिकार क्यों नहीं दिए जाते? उसे कमजोर क्यों समझा जाता है?
मेरे विचार से हर क्षेत्र में महिला को पचास प्रतिशत की हकदारी के अधिकार प्राप्त होने ही चाहिए। जमीन जायदाद में भी पुरुष के नाम के साथ महिला( पत्नी) का नाम भी अवश्य जुड़ना चाहिए ताकि पुरुष( पति) और महिला( पत्नी) दोनों एक दूसरे के पूरक बन पाएं। महिला के बिना पुरुष अधूरा है और पुरुष के बिना महिला भी अधूरी है। एक दूसरे के बिना दोनों का कोई अस्तित्व नहीं है
युगों युगों से महिला इस पुरुष प्रधान समाज में अनेकों प्रकार के दुःख झेलती चली आ रही है। उसे पुरुषों के समान पूरे अधिकार देने होंगे ताकि एक स्वस्थ और खुशहाल समाज की परिकल्पना की जा सके।
डॉ पी सी कौंडल, हिमाचल प्रदेश

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