मैं अकेला राही हूं - उमेश नाग
मैं अकेला राही हूं,
चला हूं अकेला।
अनजानी राहें हैं,
पूछती हैं मेरा पता।
अलबेला हूं मस्त हूं,
फिक्र नहीं किसी की करता हूं।
अपनी ही दुनिया में व्यस्त रहता हूं,
नही किसी और की यादें,
न ही किसी को भूला बैठा हूं।
अकेले होने के पल गुजारें,
मायूसी के आलम का दर्द भी सहा।
तुम तो बेवफा बनें हो,
अकेला हमें छोड़ दिया है।
मगर हम तो खुशमिजाज हैं प्रिय,
अकेला तो क्या हर हाल
में मस्त व दिवाने रहते हैं।
श्रीमती उमेश नाग जयपुर राजस्थान

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