यह मात्र ढाई अक्षरों का शब्द नहीं, बल्कि अनंत ब्रह्मांड की वह ऊर्जा है जो कण-कण में व्याप्त है। 'ईश्वर' शब्द का अर्थ है वह जो 'ऐश्वर्य' से संपन्न हो, जो सबका स्वामी हो और जिसमें समस्त सृजन, पालन और संहार की शक्ति निहित हो।
ईश्वर का अर्थ केवल मंदिरों की मूर्तियों या धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं है। वह एक ऐसी चेतना है, जिसे शब्दों में बांधना असंभव है। यदि हम ध्यान से देखें, तो ईश्वर की उपस्थिति को हम प्रकृति के हर स्वरूप में महसूस कर सकते हैं। सुबह की पहली किरण में जो तेज है, खिले हुए फूल में जो सुगंध है, और बहती हुई नदी में जो संगीत है—वह सब ईश्वर का ही विस्तार है।
अध्यात्म की दृष्टि से, ईश्वर का सबसे शुद्ध रूप हमारे भीतर विद्यमान है। उपनिषद कहते हैं, 'अहं ब्रह्मास्मि'—अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ। जब हम अपने अहंकार को त्याग कर प्रेम, करुणा और सेवा के मार्ग पर चलते हैं, तब हमें उस परम सत्ता का अनुभव होता है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं, बल्कि स्वयं की खोज अनिवार्य है। जब मन निर्मल होता है, तो हृदय का प्रत्येक स्पंदन 'ईश्वर' का ही नाम जपता प्रतीत होता है।
अंततः, ईश्वर विश्वास का दूसरा नाम है। वह दुखों में सहारा है, अंधेरे में प्रकाश है और भटकते हुए मन के लिए परम शांति है। वह निराकार भी है और साकार भी; वह निर्गुण भी है और सगुण भी। वह केवल आस्था की वस्तु नहीं, बल्कि अनुभूति का विषय है। जिस क्षण हम स्वयं को संपूर्ण समर्पण के साथ उस परमात्मा को सौंप देते हैं, उसी क्षण 'ईश्वर' शब्द हमारे जीवन का सबसे जीवंत सत्य बन जाता है।
डॉ रुपाली चौधरी
महाराष्ट्र
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