बादलों की ओट में
खिला छुपा चाँद
पहाड़ों पर जाती पगडण्डी
मन आकाश में
चाँद के इंतजार में
घुप्प अंधेरा रात स्याही
विरहन सी
पत्तों की सरसराहट
उल्लू की कराहती आवाज
लगता मृत्यु जीवन को गले लगाए बैठी
चाँद निकला बादलों से
सूखे दरख्तों सूखी नदी ने
ओढ रखा हो धवल चाँदनी का कफ़न
जंगल कम ,नदी प्रदूषित हो सूखी
मानों ऐसा लगता
मौत हो चुकी पर्यावरण की
धरा से आँखे चुराता चाँद
छुप जाता बादलों की ओट
निंदिया टूटी स्वप्न छूटा
भोर हुई
नई उम्मीदों से जंगल सजाने
नदी की कलकल
चिड़ियों की चहचाहट ने दिया
पर्यावरण को पुनर्जन्म।
संजय वर्मा "दृष्टि "
मनावर जिला धार (म प्र )

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