धर्म - गोरक्ष जाधव
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अगर सबका एक ही धर्म होता,
अगर एक ही ईश्वर को वह मानता ,
फिर भी इंसान झगडने का,
कोई ना कोई बहाना ढूंढता।
अगर सबका एक ही धर्म होता.…
जलता दीया सबको एक-सी रोशनी है देता,
उगता सूरज सबको प्यार से संभालता
फिर भी मानव मानवता की राह छोड़कर
चाँद सूरज की रोशनी पर मज़हबी रंग चढ़ता।
अगर सबका एक ही धर्म होता....
ढूंढता है वह पत्थर में भगवान,
निशानों में निर्रथक अभिमान,
लेन-देन में भी फरेब कर देता,
मिलता गर खुदा तो,
उसे भी गुलाम बना देता।
अगर सबका एक ही धर्म होता...
वह भूल गए हैं संतों की सीख को,
प्रेषितों की उपदेश औऱ जीने की रीत को,
हर कोई एक-दूसरों से जुदा मान रहा है,
खुद को बस वह खुदा मान रहा है।
अगर सबका एक ही धर्म होता...
एक ही अंश है सब में स्थित,
एक ही ज्योति है सब में प्रज्वलित,
फिर भी भिन्न भाव सब में है रखता,
कुछ न कुछ निज स्वार्थ विपरीत है करता।
अगर सबका एक ही धर्म होता....
धर्म आचरण की पवित्र रीति है,
ईश्वर तक पहुंचने की पद्धति है।
सत्य को धर्म धारण है करता,
व्यर्थ मिथ्य को धर्म है त्यागता।
अगर सबका एक ही धर्म होता....
अगर सबका एक ही धर्म होता,
अगर एक ही ईश्वर को वह मानता ,
फिर भी इंसान झगडने का,
कोई ना कोई बहाना ढूंढता।
अगर सबका एक ही धर्म होता....
गोरक्ष जाधव
मंगलवेढा, महाराष्ट्र

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