
दीये की लौ - प्रो. स्मिता शंकर
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जब सुबह देर से दस्तक दे
और रात लंबी लगने लगे,
जब अपने भी सवाल बन जाएँ
और मौन भारी होने लगे,
तब मन के किसी कोने में
धीरे-धीरे जल उठती है
एक छोटी-सी लौ—
वही पहला विश्वास।
टूटे सपनों की चुभन में
जब शब्द भी घायल हों,
और रास्ते पत्थर-से सख़्त,
पाँव थककर रुकना चाहें,
तब बिना शोर किए
हाथ थाम लेता है
एक अदृश्य सहारा—
जिसे कहते हैं विश्वास।
न मंज़िल पास दिखती है,
न दिशा साफ़ नज़र आती,
फिर भी कदम आगे बढ़ते हैं,
क्योंकि भीतर कहीं
यह यक़ीन साँस लेता है
कि हर अँधेरे के बाद
उजाले का एक दिन होगा—
इसी से बनता है जीवन का विश्वास।
कभी वही लौ
आँखों की नमी बन जाती है,
कभी चुप्पी में ढलकर
हिम्मत की भाषा सिखाती है।
यह न दिखती है, न सुनाई देती,
फिर भी टूटने नहीं देती।
कठिन मोड़ों पर
जब सब कुछ छूटता सा लगे,
तब यही भीतर की ताक़त
संभाल लेती है बिखरते पल।
शायद इसी कारण
मन हर बार फिर कह उठता है—
चलना अभी बाकी है।
9.कोहरा : एक चेतावनी
सुबह-सुबह फैला यह सफ़ेद कोहरा,
पहले कभी सुकून देता था—
जैसे प्रकृति अपने हाथों से
धरती पर शांति बिछा रही हो।
पर अब यह कोहरा
कहानी कुछ और कहता है।
धुंध के भीतर घुला
धुआँ, धूल और जहरीली परतें
धीरे-धीरे हमारी साँसों में
अपना घर बना लेती हैं।
सड़कें धुँधली, आसमान भारी—
सब बताता है कि यह कोहरा
केवल मौसम का खेल नहीं,
एक गंभीर इशारा है।
पेड़ों की शाखों पर जमी राख
चुपचाप गवाही देती है
कि शहर की चिमनियों और वाहनों ने
हवा को बोझिल कर दिया है।
कचरे का धुआँ, प्लास्टिक का जलना,
बेकाबू प्रदूषण—
ये सब मिलकर रचते हैं वह आवरण
जो आँखों को चुभता है,
फेफड़ों को थका देता है,
और हर नई सुबह को
भयावह बना देता है।
हम भूल जाते हैं
कि प्रकृति की हर परत
हमारे व्यवहार का दर्पण है।
यह घना, हानिकारक कोहरा
दरअसल हमारा ही बनाया हुआ
एक मौन संदेश है—
कि अगर अभी नहीं सम्भले,
तो आने वाली पीढ़ियाँ
साफ हवा का अर्थ
सिर्फ किताबों में पढ़ेंगी।
इसलिए समय है
अंधी दौड़ रोकने का,
पेड़ों को बचाने का,
धुएँ को कम करने का,
और धरती को फिर से
साँस लेने लायक बनाने का।
कोहरा छँट जाएगा—
पर हवा को लौटने में
सालों लग जाएँगे।
हम बदलें,
तभी प्रकृति बदलेगी।
प्रो. स्मिता शंकर, बैंगलोर
Karnataka
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