जीवन - कवयित्री राजवाला पुंढीर
पावन ही रखनी तुझे मन की भावना।
जीवन है तेरा तुझे ही संभालना।।
नर तन मिला तुझे,न बेकार कर इसे
तन में भी जान है न बेजान कर इसे
जीवन है तेरा बना तन को पावना।
मन को रखना है तुझे अपने वश में
इसको रखना है डुबा भक्ति रस में
तन मन से दूरी बना रखनी वासना।
जब आएंगे संकट तो धीरज न खोना
बनता है गलहार जब तपता है सोना
तन मन से प्रभु का उपकार मानना।
ये सफर जिंदगी का बड़ा ही कठिन है
हैं कहीं कांटे तो कहीं पै अग्नि है
हर पग पर राम नाम ही है जापना।
चलना धर्म पर रहना दूर पाप से
डरना न दुख से कटना प्रभु जाप से
धीरज से करना हर दुख का सामना।
हौसले बुलंद तेरा अहम हो नदारद
जान लो सफल तेरी हो गई इबादत
अपनी मेहनत को कर्म फल मानना।
निर्धन को दानकर दुर्बल पै हाथ रख
किसी का ना दुखे मन इतना ध्यान रख
तेरी तो सफल हो जाएगी साधना।
मान मर्यादा का रखना ध्यान तू
खींच रेखा लक्ष्मण रखना मान तू
नाही कभी तू रेखा को लांघना।
सच और झूठ की लड़ाई भी होगी
सच हार, झूठ की रिहाई भी होगी
फिर भी सच पै डट करना है सामना।
जीना है शान से डरना भगवान से
लेना है ज्ञान तो लेना परवान से
दीपक बना मीत प्राणों का त्यागना।
बनें अपने दुश्मन तो बड़ा दुख होता
आंखें हों सूखी दिल फूट फूट रोता
दीखे जग बेरुखी तो साहस न हारना।
पुंढीर ने जीवन की लिखदी सच्चाई
मिलती है बुराई करके भी भलाई
रूठी है जिंदगी मुश्किल संभालना।
स्व रचित
कवयित्री राजवाला पुंढीर
उत्तर प्रदेश

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