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विषय - जीवन - सुधा बसोर सौम्या
विधा - छंदमुक्त रचना
चीर सीना पत्थरों का तू जीवन का रस खींच ले।
बनमली स्वयं ही तू बस जीवन अपना सींच ले।।
हों पथ में लाखों शूल किंतु नहीं तुझे घबराना है।
साहस से उनको बना पुष्प बस आगे बढ़ते जाना है।।
मिला नहीं उपवन तो तुझे नहीं पछताना है।
बन पंकज तुझको तो कीचड़ को भी महकाना है।।
प्रतिदिन के उदय अस्त से बोलो सूरज कब हारा है।
अंधकार को नहीं सभी ने देव सूर्य को ही माना है।।
तृण तृण जाता बिखर नीड़ का जब भी ऑंधी है आती।
हर बार बनाते नीड़ विहग पर जीवन से हार नहीं भाती।।
निडर निरंतर चलते रहने से ही बस होता सार्थक जीवन है।
देती सीख यही प्रकृति भी चलते रहना ही जीवन है।।
सुधा बसोर सौम्या
उत्तर प्रदेश
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