जीवन की सीख - मालती गेहलोद
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हम साथ चले सागर तट पर,
विशालकाय सागर, अटखेलियां करती लहरें।
अनुज का मन प्यासा था, पानी को हाथों में भरा था,मुँह से लगाया, यह खारा है कहकर गुस्साया।
मैं मुस्कान लिए चल दी नदी तट पर, शांत शीतल नदी, अविरल बहती धाराएं।
अनुज को कहा, पानी हाथों में भर पीओ, पीते ही यह मीठा व शीतल है कह मुस्कुराया।
मेने अनुज को समझाते हुए कहां, तुमने सागर के अहं को देखा, वह सब अपने मे समेटे रहता । इतना विशाल जलाशय है ,परन्तु जन मानस को क्या लाभ।
इस नदी की निच्छलता देखी तुमने, जितना पास सारा बाँट देती , इसका शीतल पानी, जनमानस को तृप्त करता।
इसलिए सदैव नदी की तरह निर्मल बनो , सागर जैसे कठोर व तटस्थ, अहंकारी नही क्योकि विशालता अक्सर अंहकार से बोनी हो जाती है।
लेखक- श्रीमती मालती गेहलोद मंदसौर (म.प्र.)

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