नफ़रत - कवयित्री राजवाला पुंढीर
आग नफ़रत की है हम जलते हैं रोज।
प्यास उल्फ़त की है हम तरसते हैं रोज।।
जबसे आया है होश प्यार सबसे किया
बदले आया है रोज जहर हमने पिया
साथ नफ़रत ही है संग रहते हैं रोज
बात मुहब्बत की है हम तरसते हैं रोज।
प्यार से जीतने की रही मन में ललक
प्यार से देखने की मिली एक ना पलक
हार मुहब्बत की है गम सहते हैं रोज
बात शोहरत की है हम तरसते हैं रोज।
हम जिक्र क्या करें सपनों की बातों का
हम फिक्र क्या करें अपनों की बातों का
रात तोहमत की है हम सहते हैं रोज
बात सोहबत की है हम तरसते हैं रोज।
हर रिश्ते में नफ़रत ही दिखती है बहुत
संबंधों में अल्पमत ही मिलती है बहुत
बात मोहलत की है हम देते हैं रोज
बात नुसरत की है हम तरसते हैं रोज।
देख खुश अपनों को क्यों जलते हैं लोग
देख खुश जिंदगी खुद की हंसते हैं लोग
हाथ मशक्कत की है हम करते हैं रोज
बात दौलत की है हम तरसते हैं रोज।
धर्म के नाम पर घृणा बढ़ती है क्यों
जाति के नाम पर घृणा बढ़ती है क्यों
बात नसीहत की है हम देते हैं रोज
बात जुर्रत की है हम गरजते हैं रोज।
एक ही है सुनो वो राम,अल्लाह,मसीह
ये जो समझे ना बात वो है बदनसीब
प्यार इनायत ही है हम करते हैं रोज
बात मैयत की है हम तो मरते हैं रोज।
कहती पुंढीर है ना कभी मूर्ख बनो
जग है अपना ही सारा तुम सबकी सुनो
प्यास हजरत की है हम तरसे हैं रोज
बात हुज्जत की है हम करते हैं रोज।
स्व रचित
कवयित्री राजवाला पुंढीर
एटा उत्तरप्रदेश
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