अटखेलियां करती पतंग
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अनीता चमोली (देहरादून)
सजा है आसमान नीली पीली
हरी गुलाबी पतंगांे से
और महक रहा है आज
घर गुड़ तिल के
लड्डूओं की खुशबू से
मकर संक्रांति के इस
त्योहार पर जैसे
न्यौता दिया हो सूरज को
मुंह मीठा करने का
एक साथ सभी ने
उत्सव मना रहा आसमान
सुनहरी धूप की
रूपहली छटा में
रंग रहा सभी को
अपने रंग में और
पंछियों की कलरव के साथ
बहक रहा है जैसे
कि खिलते फूल बहकते लहकते
मंद-मंद मस्त हवा में
लहराती बलखाती पतंगें जैसे
ललचा रही हो किरणों को
कहती हुई यही कि-
’आओ हमारे संग-संग
तुम भी अटखेलियां करो!’
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