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सनातन/धर्म
सनातन ही ऐसा धर्म है,
जिसका ना आदि न अंत है।
वसुधैव कुटुंबकम भाव ,
सनातन ही संपूर्ण धर्म है।।
वेद उपनिषद रामायण गीता,
सब में कर्म प्रधान बताया है।
रची रामायण वाल्मीकि ने,
व्यास ने वेदों को गाया है।।
प्रेम की वश में राम ने,
शबरी के झूठे बेरों को खाया।
मिला सभी को मान कर्म से,
वर्ण भेद से कुछ ना पाया।।
कर्म ही धर्म बड़ा,
निष्काम भाव से कर्म करो,
जात-पात को भूलकर,
अंतस सनातन धर्म भरो।।
अतिथि देवो भव धर्म सनातन,
होता पुरुखों का अर्चन मान,
शील विनय और भक्ति जहां
बसते हैं वहां भगवान।।
सच है सनातन धर्म,
इंसान मिटता है सिद्धांत नहीं।
यह नींव है सनातन की,
झूठ इसमें वृतांत नहीं।।
सत्य का दर्शन है जहां,
श्रुतियों के धर्म का मंत्र है,
यह वही सनातन है,
जिसका आदि है न अंत है।।
@पदमा तिवारी दमोह मध्य प्रदेश

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