Wednesday, 8 April 2026

भगवान महावीर के अहिंसा सिद्धांत की दशा- दिशा - डॉ.बी.आर.नलवाया

भगवान महावीर के अहिंसा सिद्धांत की दशा- दिशा - डॉ.बी.आर.नलवाया

जैन धर्म के  चोबीसवे  तीर्थंकर ,अहिंसा के अग्रदूत श्रमण 
 भगवान महावीर स्वामी की 2626 वीं जयंती को पावन पर्व  के अवसर पर आज महावीर स्वामी के अनुयायी दुनियाभर में मना रहे हैं। भगवान महावीर स्वामी का जन्म लगभग 2626 वर्ष पूर्व राजा सिद्धार्थ व महारानी त्रिशला के यहाँ चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के पावन दिन हुआ था। भगवान महावीर एक क्रान्तिकारी , युगदृष्टा महापुरुष थे। उन्होंने देखा कि सामाजिक जीवन में न केवल आर्थिक विषमता है, प्रत्युत वर्ग भेद भी  इतना अधिक  है, कि मानव-मानव के मन में एक-दूसरे के प्रति ममता और सौहार्द के स्थान पर घृणा और ग्लानि कुट- कुट कर घर कर गई है। समाज में स्त्रियों का स्थान अत्यंत नगण्य माना जाता है। दास और दासियों के रूप में मनुष्य स्त्री और बालकों का क्रय-विक्रय ठीक उसी प्रकार किया जाता है, जिस प्रकार भोग और उपभोग की वस्तुओं का करते हैं। इन हालातों को देखते हुए महावीर का स्वामी का चिन्तन दिनों-दिन बढ़ता ही गया। महावीर की इन्हीं चिन्तनशीलता और पारिवारिक जीवन तथा ऐश्वर्य और विलास के प्रति बढ़ते  हुए निरपेक्ष भाव को परिजन धीरे-धीरे आँक रहे थे। परिजन का विचार था, महावीर विवाह करके सुखमय जीवन व्यतीत करें। माता-पिता के देहावसान के बाद महावीर ने अपने बड़े  भ्राता  नंदीवर्धन के समक्ष 28 वर्ष की आयु में प्रवॖज्या लेने का प्रस्ताव रखा।
भगवान महावीर ने 30 वर्ष तक नगर- नगर और ग्राम- ग्राम विहार करते हुए, समवशरण सभाओं में जन- भाषा में जनकल्याण के लिए उपदेश देते रहे। विहार के दौरान जगह-जगह यज्ञ बड़े पैमाने पर होते हुए, देखे गए। यज्ञों में मनो (Quintal) घी- दूध जौ-तिल आदि खाद्यान्न तथा गाय और घोड़े आदि पशु बहुतायत में भस्म किए जाते थे। महावीर ने यज्ञों का विरोध किया । तब जनमानस में यज्ञ विरोध विकसित हुआ । तब भगवान महावीर ने अहिंसा धर्म के उपदेश दिए। महावीर ने कहा **"संसार में सब जीव जीने की कामना करते हैं, मरना कोई नहीं चाहता है।"**
सब सुख के इच्छुक हैं, दुख के नहीं। महावीर ने कहा * सभी जीवों के प्रति समभाव रखना अहिंसा है,* इसके साथ ही राग और द्वेष से मुक्त होना अहिंसा है। यद्यपि भी सभी धर्म में अहिंसा को सर्वोपरि सिद्धांत माना है ,तथापि उनमें जैन धर्म तथा भगवान महावीर का स्थान प्रमुख है। किसी भी धर्म में हिंसा, असत्य, चोरी, दुराचार, परिग्रह ,क्रोध, मान ,माया, लोभ असंयम आदि को धर्म नहीं माना गया है। 
प्रत्येक प्राणी की आत्मा स्वतंत्र है ,तब आप उसके जीवन के अधिकारों  का हनन नही  कर सकते। इससे आपके मन में प्रत्येक जीव के प्रति दया एवं करुणा की भावना जाग्रत होगी और इसी के परिणामतः विश्व में शांति एवं सौहार्द की भावना उजागर होगी। जैन धर्म में अहिंसा' का अर्थ के बल मनुष्य की हिंसा करने मात्र तक सीमित नहीं है ,वरन् प्राणी मात्र और यहाँ तक कि पृथ्वी, जलवायु, अग्नि आदि में विद्यमान चर्मचशुओं के दृष्टिगोचर नहीं होने वाले जीवो की हिंसा नहीं करने से है। क्योंकि "प्रत्येक प्राणी को अपना जीवन प्रिय है।" अतः किसी भी प्राणी को दुख नही पहुँचना चाहिए और न ही किसी के प्रति वैर-विरोध का भाव रखना चाहिए। व्यक्ति को सब जीवों के प्रति मैत्री का भाव रखनी चाहिए।अगर हम महावीर से प्रेम करते हैं , तो अहिंसा को फिर से जीवित करने का संकल्प ले । पर्दों पर अहिंसा के संदेश लिखने की बजाय, जीवन में अहिंसा लाए। अहिंसा के बैनर हाथों में रखना और हिंसा  करके  हिंसक वस्तुओं का उपयोग करना, हिंसा का व्यापार करना तथा हिंसक वस्तुओं का उपभोग करना कहां का न्याय है ? 
अतः स्पष्ट है कि वर्तमान में अशांति, आंतकी, भ्रष्ट और हिंसक वातावरण में महावीर की अहिंसा ही शांति प्रदान कर सकती है। मन में किसी के प्रति बुरा विचार लाना भी हिंसा है। मानव के मन में अहिंसा की भावना का विकास होना चाहिए। भगवान महावीर मे आत्मिक और शाश्वत" सुख की प्राप्ति हेतु  दुनिया को यह पांच सिद्धांत भी बताए हैं, जिनमें  अहिंसा  सिद्धांत तो है ही साथ ही सत्य, अपरिग्रह, अस्रेय और  ब्रह्मचर्य । अहिंसा सिद्धांत की दशा-दिशा यही है कि "जियो और जीने दो "। 

*डॉ.बी.आर.नलवाया, पूर्व प्राचार्य, मंदसौर*

यहां सबकी अपनी आस्था है - रजनीश कुमार "गौरव"

 यहां सबकी अपनी आस्था है - रजनीश कुमार "गौरव"

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श्रद्धा भाव और प्रेम विश्वास के बिना एक अच्छी ज़िंदगी की कल्पना नहीं किया जा सकता है। हमें माननी पड़ती है किसी को अपना उस्ताद, गुरु, अभिभावक और भगवान और यही सिखाती है हमें जीवन में अनुशासन और कही न कही यही हमें महान् भी बनाता है। इसका होना ही एक आस्था है;जो हमें प्रेरित करती है कुछ अच्छा करने के लिये और जीवन में नए एवं ख़ास मुकाम हासिल करने के लिए। बशर्ते कि हमें यह ज्ञात होना चाहिए़ कि यहां सबकी अपनी अपनी आस्था है , जिस राह में कांटे नहीं  हमें फूल उगाते चलना चाहिए, ताकि सभी के आस्था और भावनाओं का सम्मान हो सके।
इसी सोच तथा संकल्प के साथ अपने गुरु, अभिभावक और देवी देवताओं की समृद्ध विरासत को समाज में हम बेहतरीन ढंग से आगे बढ़ा सकते है, क्योंकि यही हमारी परम्परा रही है ।
यह आवश्यक है मगर स्वार्थ से परे होकर आस्थावान बनना अलग बात है, क्योंकि,हर जाति ,धर्म , रिश्ते - नाते,दोस्त और इंसान के प्रति समान भाव व्यक्त करना ही तो हमारा फ़र्ज़ है।इसी भावना के साथ हम अपने भगवान को तो पूजते ही है बल्कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी,संविधान निर्माता डॉ.भीम राव अम्बेडकर, चाचा नेहरु,नेता जी सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह,रामप्रसाद बिस्मिल, देशभक्त हामिद , वैज्ञानिक राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम साहब , प्रधानमंत्री रहे कविवर अटल बिहारी बाजपेयी जैसे अनेक महान् पुरुषों , वीरों एवं शहीदों के प्रति भी हमारी आस्था है , जिन्हें हम आदर के साथ नमन करते है ।यही हमारी बड़प्पन है और यही हमारी इंसानियत।
      
        - रजनीश कुमार "गौरव"
              सारण, बिहार 

खुशियाँ - मंजुला शरण "मनु"

खुशियाँ - मंजुला शरण "मनु"
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"खुशी " सिर्फ़  दो अक्षरों का एक शब्द मात्र नहीं है। बल्कि खुशी जीवन की वह अनुभूति है, जो सभी जीव के लिए ऐसी  अनुभूति है,जिसका सीधा संबंध किसी विशेष भावनात्मक अवस्था से है। 
मनुष्य और पशु-पक्षी,वनस्पति  सभी में चेतना होती है। चूंकि मनुष्य सब जीवों में सब से अधिक चैतन्य जीव है, अतः उसकी खुशियों की अनुभूतियाँ अनेक प्रकार की होती हैं।  
मनुष्य से इतर पशु पक्षी और वनस्पति आदि की खुशियाँ केवल आहार, सकारात्मक वातावरण और परिस्थितियों तक ही सीमित हैं।  किन्तु, मनुष्य की खुशियों के अनेक आयाम और स्तर बँटे हुए  हैं, उसी प्रकार  उसकी खुशियों के स्तर का फ्रेम भी छोटा और बड़ा होता है। 
एक दिहाड़ी मजदूर की खुशी उसकी शाम को मिलने वाली एक दिन की कमाई है। वैसे ही किसी  बड़े  राजनेता, अभिनेता, शिक्षाविद, छात्र, कलाकार, और वैज्ञानिक की खुशी उसका  टारगेट है।
एक गृहणी की खुशी उसके व्यवस्थित घर और पारिवारिक दायित्वों की पूर्णता है। 
अमूमन सभी के दिन की शुरुआत एक कप चाय के साथ शुरू होती है, जो उसके स्तर और उसके प्याले से उसे सुकून के साथ एक अनकही खुशी देती है। 
दैनिक खुशियों के साथ मनुष्य की खुशियाँ पारंपरिक त्यौहारों, उत्सवों,अनुष्ठानों, सामाजिक और पारिवारिक शादी-ब्याह, जन्मोत्सव, जन्मदिन जैसे उपलक्ष्य अपनों के साथ साझा करके खुशी पाना। मनोनुकूल उपलब्धियाँ, सुखद यात्रा ,दर्शनींय स्थलों की सैर, मधुर संगीत, उपहार-सम्मान, प्रशंसा, प्रतीक्षित वस्तु या व्यक्ति से मिलना खुशी है। मतलब वह जिसके मिलने से मन सुखी हो।

मंजुला शरण "मनु"
राँची, झारखण्ड़।