यहां सबकी अपनी आस्था है - रजनीश कुमार "गौरव"
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श्रद्धा भाव और प्रेम विश्वास के बिना एक अच्छी ज़िंदगी की कल्पना नहीं किया जा सकता है। हमें माननी पड़ती है किसी को अपना उस्ताद, गुरु, अभिभावक और भगवान और यही सिखाती है हमें जीवन में अनुशासन और कही न कही यही हमें महान् भी बनाता है। इसका होना ही एक आस्था है;जो हमें प्रेरित करती है कुछ अच्छा करने के लिये और जीवन में नए एवं ख़ास मुकाम हासिल करने के लिए। बशर्ते कि हमें यह ज्ञात होना चाहिए़ कि यहां सबकी अपनी अपनी आस्था है , जिस राह में कांटे नहीं हमें फूल उगाते चलना चाहिए, ताकि सभी के आस्था और भावनाओं का सम्मान हो सके।
इसी सोच तथा संकल्प के साथ अपने गुरु, अभिभावक और देवी देवताओं की समृद्ध विरासत को समाज में हम बेहतरीन ढंग से आगे बढ़ा सकते है, क्योंकि यही हमारी परम्परा रही है ।
यह आवश्यक है मगर स्वार्थ से परे होकर आस्थावान बनना अलग बात है, क्योंकि,हर जाति ,धर्म , रिश्ते - नाते,दोस्त और इंसान के प्रति समान भाव व्यक्त करना ही तो हमारा फ़र्ज़ है।इसी भावना के साथ हम अपने भगवान को तो पूजते ही है बल्कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी,संविधान निर्माता डॉ.भीम राव अम्बेडकर, चाचा नेहरु,नेता जी सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह,रामप्रसाद बिस्मिल, देशभक्त हामिद , वैज्ञानिक राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम साहब , प्रधानमंत्री रहे कविवर अटल बिहारी बाजपेयी जैसे अनेक महान् पुरुषों , वीरों एवं शहीदों के प्रति भी हमारी आस्था है , जिन्हें हम आदर के साथ नमन करते है ।यही हमारी बड़प्पन है और यही हमारी इंसानियत।
- रजनीश कुमार "गौरव"
सारण, बिहार

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