गुरु -शिष्य - गोरक्ष जाधव
गुरू से शिष्य का नाता,
श्रद्धा, भाव,अनन्यता,
चले गुरु की राह पर,
शिष्य का गहना है विनम्रता।
गुरु ज्ञान का आकाश,
गुरु ज्ञान का प्रकाश,
गुरु ही शिष्य का विश्वास,
गुरु मुक्ति की आस।
षडविकारों से हारे जब शिष्य,
गुरु दिखाए जीवन का रहस्य,
स्वयं का स्वयं से कराए परिचय,
गुरु शिष्य का बने उपास्य।
धैर्य, श्रद्धा और समर्पण,
शिष्य करे पंचप्राण अर्पण,
दृढ़ रहे अपने पथ पर,
अड़िग रहे गुरु मत पर।
गुरु शिष्य का दीक्षक,
गुरु शिष्य का संरक्षक,
आत्मज्ञान का पढ़ाए पाठ,
गुरु शिष्य का बने आत्मरक्षक।
सद्गुरु बिन शिष्य अधुरा,
सद्गुरु बिन शिष्य का ज्ञान कोरा,
इक दूजे बिन न चले ज्ञान की परम्परा,
गुरु बिन अज्ञान का अंधेरा ग़हरा।
गोरक्ष जाधव©®
मंगलवेढा, महाराष्ट्र

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