Thursday, 1 January 2026

देश खतरे में है - रशीद अलक़ादरी


 देश खतरे में है - रशीद अलक़ादरी

उनके लिए गाय कोई माता नहीं 
राजनीति का बस हिस्सा है 
गौ रक्षा दल बताने वाले काट रहे गौ 
यही बस हक़ीक़ी किस्सा है 

संविधान , विधि विधान , अदालत मगर न्याय उन्ही का 
जिसके हाथों में राजनीतिक सिक्का है 

क़ानून क़ानून के रखवाले ,पत्रकार मीडिया 
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ सब बिक चुका है 

अल कबीर अल हम्द अरेबियन एक्सपोर्ट अल नूर
मुसलमान और मुसलमान का नाम रोज़गार का हिस्सा है 

धर्म ख़तरे में नहीं देश ख़तरे में है इंसानियत ख़तरे में है राशिद 
यही हक़ीक़ी क़िस्सा है यही हक़ीक़ी क़िस्सा है

रशीद अलक़ादरी (झारखंड )

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ईश्वर - डॉ रुपाली चौधरी

 
ईश्वर - डॉ रुपाली चौधरी

यह मात्र ढाई अक्षरों का शब्द नहीं, बल्कि अनंत ब्रह्मांड की वह ऊर्जा है जो कण-कण में व्याप्त है। 'ईश्वर' शब्द का अर्थ है वह जो 'ऐश्वर्य' से संपन्न हो, जो सबका स्वामी हो और जिसमें समस्त सृजन, पालन और संहार की शक्ति निहित हो।
​ईश्वर का अर्थ केवल मंदिरों की मूर्तियों या धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं है। वह एक ऐसी चेतना है, जिसे शब्दों में बांधना असंभव है। यदि हम ध्यान से देखें, तो ईश्वर की उपस्थिति को हम प्रकृति के हर स्वरूप में महसूस कर सकते हैं। सुबह की पहली किरण में जो तेज है, खिले हुए फूल में जो सुगंध है, और बहती हुई नदी में जो संगीत है—वह सब ईश्वर का ही विस्तार है।
​अध्यात्म की दृष्टि से, ईश्वर का सबसे शुद्ध रूप हमारे भीतर विद्यमान है। उपनिषद कहते हैं, 'अहं ब्रह्मास्मि'—अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ। जब हम अपने अहंकार को त्याग कर प्रेम, करुणा और सेवा के मार्ग पर चलते हैं, तब हमें उस परम सत्ता का अनुभव होता है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं, बल्कि स्वयं की खोज अनिवार्य है। जब मन निर्मल होता है, तो हृदय का प्रत्येक स्पंदन 'ईश्वर' का ही नाम जपता प्रतीत होता है।
​अंततः, ईश्वर विश्वास का दूसरा नाम है। वह दुखों में सहारा है, अंधेरे में प्रकाश है और भटकते हुए मन के लिए परम शांति है। वह निराकार भी है और साकार भी; वह निर्गुण भी है और सगुण भी। वह केवल आस्था की वस्तु नहीं, बल्कि अनुभूति का विषय है। जिस क्षण हम स्वयं को संपूर्ण समर्पण के साथ उस परमात्मा को सौंप देते हैं, उसी क्षण 'ईश्वर' शब्द हमारे जीवन का सबसे जीवंत सत्य बन जाता है।
​    डॉ रुपाली चौधरी
    महाराष्ट्र

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धर्म - महाकवि डां अनन्तराम चौबे अनन्त

 

राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी 
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
विषय ...धर्म - महाकवि डां अनन्तराम चौबे अनन्त  
कविता... धर्म 

माता पिता का सम्मान करना 
ये भी धर्म-कर्म हमें  करना है।
माता पिता के आदर्शो पर 
चलकर जीवन सफल बनाना है ।

धर्म करने में महिलाएं
भजन-कीर्तन  करती रहती है
पति और बच्चों की दीर्घायु की 
कामना हमेशा करती रहती है ।

धर्म के नाम पर भजन कीर्तन 
पूजा पाठ करते रहना चाहिए ।
धर्म-कर्म ईश्वर सब देखता है
ईश्वर पर विश्वास रखना चाहिए।

धर्म आस्था से जुड़ा हुआ है 
सनातन हिन्दू धर्म हमारा है ।
आपस में सभी मिलकर रहते
ऐसा हिन्दुस्तान हमारा है  ।

सनातन धर्म और हिन्दू धर्म 
आपस में ही जुड़ा हुआ है ।
सच वेद पुराण सनातन से हैं
जो सत्य मार्ग से जुड़ा हुआ है ।

दीपावली में लक्ष्मी जी के साथ 
गणेश जी की पूजा करते है ।
गाय और बछड़ों को साथ में
टीका लगा माला पहनाते हैं ।

सनातन धर्म की संस्कृति है
और हिन्दू धर्म की सभ्यता है ।
गणेश जी की पूजा करना ही
सनातन सभ्यता की पहचान है।

हमारे देश में पेड़ पौधे और
पशु पक्षियों की पूजा करते हैं। 
सारा सच नदी पहाड पत्थरों को 
भी देवी देवता की तरह मानते हैं।

पीपल बरगद आवले को
भगवान की तरह पूजते है ।
गाय को माता और बैल को
नंदी की तरह भी पूजते है ।

पक्षियों में भी कौवों को भी
पुरखा मान खाना खिलाते है ।
नाग पंचमी के दिन भी सांपों को
दूध पिला कर पूजा करते हैं ।

सारा सच पहाड पत्थरो को 
भी देवता की तरह मानते है ।
सारा सच मां शारदे मैहर की देवी
ऊंचे पर्वत पर ही विराजी हैं ।

तरह तरह की भावनाएं भी
सनातन संस्कृति से जुड़ी हुई हैं।
गाय के गोबर को शुद्ध मानते है
इससे घर आंगन को लीपते हैं ।

कोई शुभ कार्य करने से पहले 
गोबर से लीपा पोती करते हैं ।
गोबर से बनी गणेश जी की 
मूर्ति की प्रथम पूजा करते हैं।

गोबर से कंडे भी बनते है
कंडे की आग भी बनती है ।
सारा सच है पूजा हवन में 
कंडे की आग से पूजा होती है ।

सनातन धर्म और हिन्दू धर्म 
यही तो हमारी आस्था भी है ।
सनातन संस्कृति विश्वास है ।
सच भगवान में आस्था भी है ।

कुछ जातियां के परिवार 
धर्म परिवर्तन कर रहे है ।
हिन्दू धर्म को छोड़ करके
ईसाई धर्म अपना रहे हैं ।

ईसाई धर्म अपनाने से
मोटी रकम जो देते हैं ।
आरक्षण का भी  सभी
 फायदा सब कुछ लेते हैं ।

 महाकवि डां अनन्तराम चौबे अनन्त 
   जबलपुर म प्र

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विश्वास - पदमा तिवारी


विश्वास - पदमा तिवारी 

सारा सच प्रतियोगिता 

विश्वास वो धागा  है,
जो सबको जोड़े रखता है।
विश्वास पर कायम संसार,
वश में सबको करता है।।

निराशा से दूर रहकर,
मन में आश रखते हैं।
मनोबल को ऊंचा रख,
लक्ष्य को हासिल करते हैं।।

हो आत्मविश्वास अडिग,
राहें सुगम होती हैं।
जीवन के कुरुक्षेत्र में, 
सफलता तभी मिलती है।।

निशा के बाद होती भोर,
यही प्रकृति का नियम है। 
ऊंचा मनोबल ही,
उज्जवल भविष्य के कदम हैं।।

सारा सच है यही है,
सोना तपकर निखरता है।
ठोकर खाने के बाद, 

तम के बीच जुगनू सा चमकता है।।
सर्वाधिकार सुरक्षित

पदमा तिवारी 
दमोह मध्य प्रदेश

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कर्म ही धर्म हैं - डॉ.बी. आर. नलवाया

कर्म ही धर्म हैं - डॉ.बी.आर.नलवाया

धर्म वही है-- जिसे धारण किया जा सके। नदी का धर्म-प्यासे को पानी पिलाना ,  वृक्ष का धर्म है-राहगीर को छाया देना, और शिक्षक का धर्म है-- विद्यार्थियों को सही ज्ञान की शिक्षा प्रदान करना अर्थात् कर्तव्य का ही दूसरा नाम है---धर्म। "कार्य ही पूजा है" इसका आशय भी यही है,  कि व्यक्ति अपने कर्म का निर्वहन निष्ठापूर्वक, कर्तव्य भावना के साथ करे तो यह भी धर्म से कम नहीं है।

  कर्म को पूजा या उपासना समझकर करना ही सच्चा धर्म है। जो भी काम (कर्म) आपको मिला है, हो सकता है ,आपकी रुचि के अनुरूप न हो परन्तु काम के अनुरूप यदि आप अपनी रुचि बना लेंगे तो उसमें आनंद प्राप्त होगा। एक सफाई  कर्मी- उसका नाम संतोष से पूछा गया, "तुम नहा-धोकर यह सफाई का काम क्यों करते हो। बाद में नहा लिया करो " संतोष ने जवाब दिया --"आप बिना नहाएं पूजा कर सकते है  ? नहीं न, तो यह काम ही मेरी पूजा है।" कितनी सुन्दर बात है। काम को ही पूजा मान लिया तो फिर उसका सुफल भी अवश्य मिलेगा, काम को पूरे मन से करने में भी आनंद है। जो संतोष मिलता है वह । अनुपम है। आधे-अधुरे मन से किया गया कार्य कभी सफल नहीं होता है। अपने मन से काम में खो जाने पर ही सच्चे सुख से आनंद आता है।

हर कोई हर काम नहीं कर सकता । लोहार सुनारी नही  कर सकता है, न सुनार लोहारी कर सकता है। सही व्यक्ति को सही काम ही मिलना चाहिए। हर काम को करने का समय होता है। अलग-अलग समय पर अलग-अलग कर्म अलग-अलग धर्म का निर्माण करते हैं ।
   निष्काम भाव से कर्म करते रहना ही सबसे बड़ा धर्म है। गीता में कहा गया है, "कर्म करते रहो फल की इच्छा मत करो।" पर ऐसा होता कहाँ है ? सारे काम फल की इच्छा से ही किए जाते है। दान-पुण्य इसलिए कि स्वर्ग में सीट आरक्षित रहेगी। नेकी का काम इसलिए कि उससे लोकप्रियता मिले, प्रचार,  यश-कीर्ति , प्रशंसा मिले । 
    दूसरी और यह भी शाश्वत सत्य है ,कि व्यक्ति कितना भी धन कमाले, वह केवल धरती पर ही चलता है। मृत्यु के बाद साथ केवल धर्म जाता है--- धन नहीं। इसलिए जीवन  में  अच्छे कर्मो से धर्म इकट्‌ठा करें, धन नहीं। 

*डॉ.बी. आर. नलवाया 
Madhya Pradesh

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