कर्म ही धर्म हैं - डॉ.बी.आर.नलवाया
धर्म वही है-- जिसे धारण किया जा सके। नदी का धर्म-प्यासे को पानी पिलाना , वृक्ष का धर्म है-राहगीर को छाया देना, और शिक्षक का धर्म है-- विद्यार्थियों को सही ज्ञान की शिक्षा प्रदान करना अर्थात् कर्तव्य का ही दूसरा नाम है---धर्म। "कार्य ही पूजा है" इसका आशय भी यही है, कि व्यक्ति अपने कर्म का निर्वहन निष्ठापूर्वक, कर्तव्य भावना के साथ करे तो यह भी धर्म से कम नहीं है।
कर्म को पूजा या उपासना समझकर करना ही सच्चा धर्म है। जो भी काम (कर्म) आपको मिला है, हो सकता है ,आपकी रुचि के अनुरूप न हो परन्तु काम के अनुरूप यदि आप अपनी रुचि बना लेंगे तो उसमें आनंद प्राप्त होगा। एक सफाई कर्मी- उसका नाम संतोष से पूछा गया, "तुम नहा-धोकर यह सफाई का काम क्यों करते हो। बाद में नहा लिया करो " संतोष ने जवाब दिया --"आप बिना नहाएं पूजा कर सकते है ? नहीं न, तो यह काम ही मेरी पूजा है।" कितनी सुन्दर बात है। काम को ही पूजा मान लिया तो फिर उसका सुफल भी अवश्य मिलेगा, काम को पूरे मन से करने में भी आनंद है। जो संतोष मिलता है वह । अनुपम है। आधे-अधुरे मन से किया गया कार्य कभी सफल नहीं होता है। अपने मन से काम में खो जाने पर ही सच्चे सुख से आनंद आता है।
हर कोई हर काम नहीं कर सकता । लोहार सुनारी नही कर सकता है, न सुनार लोहारी कर सकता है। सही व्यक्ति को सही काम ही मिलना चाहिए। हर काम को करने का समय होता है। अलग-अलग समय पर अलग-अलग कर्म अलग-अलग धर्म का निर्माण करते हैं ।
निष्काम भाव से कर्म करते रहना ही सबसे बड़ा धर्म है। गीता में कहा गया है, "कर्म करते रहो फल की इच्छा मत करो।" पर ऐसा होता कहाँ है ? सारे काम फल की इच्छा से ही किए जाते है। दान-पुण्य इसलिए कि स्वर्ग में सीट आरक्षित रहेगी। नेकी का काम इसलिए कि उससे लोकप्रियता मिले, प्रचार, यश-कीर्ति , प्रशंसा मिले ।
दूसरी और यह भी शाश्वत सत्य है ,कि व्यक्ति कितना भी धन कमाले, वह केवल धरती पर ही चलता है। मृत्यु के बाद साथ केवल धर्म जाता है--- धन नहीं। इसलिए जीवन में अच्छे कर्मो से धर्म इकट्ठा करें, धन नहीं।
*डॉ.बी. आर. नलवाया
Madhya Pradesh
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