Wednesday 3 January 2024

मेरा ये नववर्ष नही है - डाॅ.योगेश सिंह धाकरे "चातक"

 मेरा ये नववर्ष नही है


नववर्ष तो आया है पर..
उल्लास नही लाया है।
दुबके हुयें है रजाई मै,
पूस की पीर हरजाई मै ।

नीरस से दिन है,
नीरस सी है रातें ।
पाश्चात्य संस्कृति की..
बे सिर-पैर की है बातें ।।

प्रकृति स्तब्ध है,
मधुरस कहाँ है ।
परिन्दे खामोश से,
कलरव कहाँ है ।

पर्व में जुड़ाव होता है,
प्रकृति में भाव होता है ।
मन मयूर नाचने लगे तो..
आध्यात्मीय प्रभाव होता है ।।

पैसे वालों का पर्व है,गरीब तो
रजाई मै दुबका पड़ा है ।
फटी रजाई टूटी झोंपड़ी का,
कहर तुमने कहाँ सहा है ।

मयखाने मै मय होगी,
पैसे वालो की जय होगी ।
धूम धड़ाका हल्ला गुल्ला,
देह प्रदर्शन खुल्लम खुल्ला ।

न तथ्य है न सत्य है,
पर युवा बड़ा मस्त है ।
भूल करके विरासत को..
विदेशी संस्कृति मै रत है ।।

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स्वरचित..
डाॅ.योगेश सिंह धाकरे "चातक"
{ओज कवि} आलीराजपुर   म.प्र

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