Monday, 15 December 2025

कूटनीतिक पर दोहे - डॉ सरिता गर्ग सरि


कूटनीतिक पर दोहे - डॉ सरिता गर्ग सरि 


कूटनीति से चल रहा, ये सारा व्यापार।
इसको झेल रहे यहां, सभी वर्ग परिवार।।

बीच नदी बगुला खड़ा, संयम रहा दिखाय।
कूटनीति को जान के, मछली रहा फसाय।।

कोयल भी सब जानती, दादुर बोले बोल। 
बोली ही अनमोल है, बाकी सब है झोल।।

कूटनीतिक बढ़ा रही, सभी देश सम्मान।
जाल साज का देश से ,घटा रही अभिमान।।

मछली को छेदे वही, जिसका तीर कमान। 
ध्यान आंख पर कीजिए, सही निशाना जान।।

कोयल ही की चाल से ,कागा पाले बाग
बोली जब बोलन लगे, जाने कोयल काग।।

हाथ जोड़ सर नत करे, पांच बरस इकबार।
जनता को कैसे छले, कूटनीति की धार।।

जाना जो संसार में,कूटनीति का ज्ञान।
बहती धारा में बहे, उसे धुरंधर जान।।

कूटनीति से चल रही, राजनीति की चाल।
जो इसमें रस बस गया, उसका उन्नत भाल।।

कौटिल्य ने बता दिया, राजनीति का ज्ञान। 
कूटनीति से ही हुआ ,मौर्य वंश महान।।

कूटनीति चंद कवि की, पृथ्वी सुनी सुजान।
आवाज सुन गौरी की, मारा तीर कमान।।

मौलिक एवं स्वरचित रचना 
डॉ सरिता गर्ग सरि 
उत्तर प्रदेश गाजियाबाद 

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