कूटनीतिक - मनीषा आवले चौगांवकर
संवाद की चतुर भाषा...."कूटनीतिक” शब्द सुनते ही हमें राजनयिक दूत, समझौते और अंतरराष्ट्रीय वार्ताएँ याद आती हैं, अथवा यह शब्द सुनते ही हमारे जेहन में श्रीकृष्ण की राजधर्म-आधारित कूटनीति उभर आती है, जिसने धर्मयुद्ध में धर्म की विजय का आधार तैयार किया था। साथ ही स्मरण होता है चाणक्य की नीति, जिसकी कूटधर्मिता ने सम्पूर्ण राजसत्ता की दिशा ही परिवर्तित कर दी।
-----लेकिन कूटनीति केवल देशों की भाषा नहीं, यह मानवीय व्यवहार की परिपक्व शैली भी है। जब सत्य को बिना चोट पहुँचाए कहना हो, या असहमति को सम्मान के साथ व्यक्त करना हो, तब भाषा कूटनीतिक हो जाती है। यह छल नहीं, बल्कि संवेदनशील संवाद का सहज रूप है।
वास्तव में देखें तो दैनंदिन की बातचीत में भी उतना ही सक्रिय रहता है। कूटनीतिक शब्दों का प्रयोग पारिवारिक रिश्तों संबंधों में तब किया जाता है,परिस्थिति सच को समझने के अनुकूल नहीं हो !यह मूलतः शब्दों का विनम्र संतुलन है।इसलिए कूटनीति केवल राजनीति की कला नहीं, जीवन जीने का व्यवहारिक विज्ञान है।
-----कूटनीतिक भाषा के पीछे उद्देश्य छल करना नहीं, बल्कि संवाद की गरिमा, स्थिति की संवेदनशीलता और आपसी सम्मान को सुरक्षित रखना,मतभेदों को विवाद बनने से रोकना होता है।उदाहरण के लिए, “आपका सुझाव विचारणीय है! यानि पूरी तरह स्वीकार्य नहीं, पर उसे नकार भी नहीं रहे।यही कूटनीति है—नकार और स्वीकार के बीच का सौम्य पुल।
----इस दृष्टि से कूटनीतिक होना समझ देता है कि सत्य भी परिस्थिति देखकर बोला जाए, क्योंकि हर सच अपनी प्रस्तुति का ऋणी होता है। संवाद अगर कला है, तो कूटनीति उसका सौंदर्यशास्त्र जहाँ शब्द तलवार नहीं, सेतु बनते हैं।
मनीषा आवले चौगांवकर
Delhi

No comments:
Post a Comment