राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य साप्ताहिक प्रतियोगिता --
"हमारी वाणी" हेतु सादर प्रेषित
विषय - देश - सुधा बसोर सौम्या
देश मेरा मुझको है प्यारा
झुका शीश मैं करुं नमन
भॉंति भॉंति के पुष्पों से ही
सुरभित है अपना ये चमन।
जाति धर्म और भाषाओं का
देश में अद्भुत लगता मेला है
हिल मिल रहते सभी साथ में
होता कभी ना कोई झमेला है।।
मिटे सभी के दिलों से नफ़रत
प्रेम भाव हो सबकी फितरत
देश मेरा हो स्वर्ग से सुन्दर
बस एक यही मेरी है हसरत।।
प्रहरी है ये देश का अपने
उच्च हिमालय पर्वतराज
शोभा बड़ी निराली इसकी
मेरे देश का है ये ताज।
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सुधा बसोर सौम्या
Utter Pradesh
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