राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य प्रतियोगिता मंच
#हमारीवाणी
#मेरी कलम मेरी पहचान
#विषय - पुस्तक - आभा सिंह
#शब्द सीमा -250
#पुस्तक काल,समाज का दर्पण है,
पुस्तक घटनाओं की पावन गंगा है..
पुस्तक मान सरोवर,विज्ञान धरोहर है,
बुद्धि का उत्कृष्ट स्त्रोत ये प्रतीति की संज्ञा है..
पुस्तकें ही सरहदों के सारे बंधन तोड़ती हैं,
पुस्तकें ही सिलसिले उम्मीदों के जोड़ती हैं..
यारों पुस्तकें ही हैं वज्हे ख्वाब लेकिन,
पुस्तकें ही नींद से मुसलसल झिंझोड़ती हैं..
पुस्तक ही मंजर और पुस्तक ही चेहरे,
पुस्तक होती फूलों सी आशनाई..
पुस्तक ही जेहन की तरावट यारों,
पुस्तक ही वज्हे - दिल रूबाई ..
पुस्तक ही है पूजा और इबादत मेरी,
पुस्तक ही है मेरी आखिरी कमाई..
सारे जहान के उलझनों से मैंने
पुस्तक में ही पनाह पाई...
करेगा जब भी कोई सवाल मुझसे,
गये दिनों का लेगा जो हिसाब मुझसे..
मैं तो चुप रहूँगी लेकिन मेरी पुस्तकें,
देंगी हर सवाल का जवाब सबको..
दिल की ख्वाहिश मेरी ज़माना सुन लो,
मुझे मेरी पुस्तकों के साथ दफना देना..
बदन के ऊपर - नीचे हों पुस्तकें यारों,
बस जनाजे को ऐसे सजाके विदा करना..
मौलिक
आभा सिंह
वाराणसी
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