Thursday, 15 January 2026

मकर संक्रांति (मकरैणी) : उत्तराखण्ड की लोकआस्था और शास्त्रीय परंपरा - धनेश्वर द्विवेदी

#मकर #संक्रांति (मकरैणी) : #उत्तराखण्ड की #लोकआस्था और #शास्त्रीय #परंपरा

#भारतीय #पर्व-परंपरा में मकर संक्रांति का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह पर्व केवल एक खगोलीय घटना का संकेत नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन, सूर्योपासना, ऋतुचक्र और लोकसंस्कृति का समन्वित उत्सव है। उत्तराखण्ड की हिमालयी सांस्कृतिक भूमि में मकर संक्रांति को मकरैणी या मकरनी कहा जाता है। यहाँ यह पर्व पंचांग की तिथि से आगे बढ़कर लोकजीवन की चेतना, सामूहिक स्मृति और संस्कार-परंपरा का रूप ग्रहण कर लेता है।
मकर संक्रांति का शास्त्रीय एवं पौराणिक आधार भारतीय शास्त्रों के अनुसार जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब मकर संक्रांति का पर्व आता है। इसी क्षण से सूर्य की गति दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाती है। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा गया है, जो आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष से जोड़ा गया है। भगवद्गीता में कहा गया है-
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥

उत्तरायण काल में देह त्याग करने वाले ब्रह्मज्ञानी परम गति को प्राप्त होते हैं। यह श्लोक मकर संक्रांति के आध्यात्मिक महत्व को स्पष्ट करता है। पुराणों में मकर संक्रांति को विशेष पुण्यदायिनी तिथि माना गया है-

मकरस्थे रवौ विप्र गङ्गास्नानं विशेषतः।
दानं च फलदं तत्र जन्मकोट्यघनाशनम्॥
सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर किया गया स्नान और दान असंख्य जन्मों के पापों का नाश करता है।

उत्तराखण्ड में तीर्थ-स्नान की परंपरा- उत्तराखण्ड को देवभूमि कहा गया है और मकर संक्रांति के दिन यहाँ के तीर्थस्थल विशेष रूप से जागृत माने जाते हैं। हरिद्वार, देवप्रयाग, ऋषिकेश जैसे स्थानों पर गंगा-स्नान की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। शीतल जल में स्नान केवल शारीरिक शुद्धि नहीं, बल्कि आत्मिक अनुशासन और तपस्वी चेतना का प्रतीक है। हिमालयी समाज की यह परंपरा जीवन में सहनशीलता, संयम और आध्यात्मिक संतुलन को दर्शाती है।

उत्तराखण्ड में मकर संक्रांति घर-घर मनाया जाने वाला लोकपर्व है। इसका स्वरूप सहज, सामूहिक और आत्मीय है। इस दिन घरों में पुरी-पकोड़ी बनाई जाती है, सामूहिक रूप से खिचड़ी पकाई जाती है
खिचड़ी को घी के साथ ग्रहण किया जाता है। परिवार, पड़ोस और रिश्तेदारी में मेल-मिलाप होता है। यह सामूहिक भोजन व्यवस्था लोकजीवन की समानता, सहभागिता और सामूहिकता को प्रकट करती है।

 खिचड़ी : लोकदर्शन और जीवन-संतुलन का प्रतीक- खिचड़ी केवल भोजन नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड के लोकदर्शन की अभिव्यक्ति है।
लोकसाहित्यकार डॉ. यशपाल सिंह बिष्ट के अनुसार- “खिचड़ी उत्तराखण्ड के लोकदर्शन का भोजन है। सादा, संतुलित और सबके लिए समान।” चावल और दाल का संयोजन समाज की विविधता में एकता का संकेत देता है, जबकि घी जीवन में ऊर्जा, पोषण और स्निग्धता का प्रतीक है।

लोककवि गिरीश तिवारी ‘गिरदा’की रचनाओं में पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जनसंस्कृति और लोकचेतना का उत्सव बनकर उपस्थित होते हैं। गढ़वाली कवि मोलाराम तथा इतिहासकार-साहित्यकार शिव प्रसाद डबराल ‘चारण’ के अनुसार  “हमारे पर्व प्रकृति के साथ संवाद हैं, शास्त्र और श्रम के बीच सेतु हैं।” यह दृष्टि मकरैणी को केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन के रूप में स्थापित करती है।

उत्तराखण्डी लोकजीवन में एक प्रसिद्ध कहावत है- “मकरैणी सूं दिन बड़ण लगछ, कष्ट घटण लगछ।” मकरैणी के बाद केवल दिन ही बड़े नहीं होते, जीवन की कठिनाइयाँ भी धीरे-धीरे कम होने लगती हैं। यह लोकविश्वास आशा, धैर्य और सकारात्मक जीवन-दृष्टि का परिचायक है।

मकर संक्रांति (मकरैणी) उत्तराखण्ड में शास्त्र, लोक और जीवन—तीनों का सजीव संगम है। यह पर्व हमें शास्त्र से आध्यात्मिक चेतना, लोक से प्रेम और सामूहिकता, तथा प्रकृति से संतुलन और सह-अस्तित्व का संदेश देता है। आधुनिक समय में जब पर्व औपचारिकता तक सीमित होते जा रहे हैं, मकरैणी यह स्मरण कराती है कि पर्व का वास्तविक अर्थ है साथ बैठना, साथ खाना और साथ जीना यही मकर संक्रांति का सच्चा महात्म्य है जो लोक में रचा-बसा, शास्त्र से पुष्ट और जीवन को उजास देने वाला पर्व।

धनेश्वर द्विवेदी
उत्तराखंड 
#HamariVani #हमारीवाणी #SaraSach #सारासच #writer #लेखक #Kavita #कविता #Sahitye #साहित्य #Poetry #काव्य 

No comments:

Post a Comment