उत्तरायण सूर्य सक्रांति - मालती गेहलोद
सूर्य पोष मास में ,मकर राशि पर जब तुम आते हो।
अपने प्रकाश पुन्ज से चंहु ओर ओस की बूंदे हटाते हो।
वेद- पुराण यह गाथा गाते , सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने आते हो।
मानव तुम पूण्य लाभ लेने गंगातट जाते ,दान -धर्म कर अपना प्रारब्ध बनाते हो।
पहले दिन भोंगी -पोंगल तो, दूसरे दिन सूर्य -पोंगल कहलाते हो।
तीसरे दिन मट्टू -पोंगल तो, चौथे दिन कानुम -पोंगल से जाने जाते हो।
कही उत्तरायण, पोंगल,मकर संक्रांति से जाने जाते हो।
तो कही बिहू ,खिचडी,पोष सक्रांति कहलाते हो।
क्या तुम जम्मू ,बिहार,बंगाल, असम,तमिलनाडु मे ही माने जाते हो।
नहीं भारत के कौने- कौने तक अपनी अमिट छाप छोड़े जाते हो।
है सूर्य ,तुम मेरे मातृभूमि की संस्कृति और सभ्यता के प्रकाश को चहूं ओर फैलाये रखते हो।
मुझ पार्थ का कोटि कोटि नमन आपको स्वीकार हो।
लेखक-
श्रीमती मालती गेहलोद
मंदसौर(म .प्र.)
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