अरावली भारत की प्राचीन धरोहर है - मनीषा आवले चौगांवकर
---अरावली यहं न केवल राजस्थान की जीवनरेखा है, बल्कि यह उत्तर भारत के जलवायु चक्र को नियंत्रित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका संरक्षण आने वाली पीढ़ियों और पर्यावरण के लिए आवश्यक है।
---अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे पुरानी वलयाकार पर्वत श्रृंखलाओं में से है। उत्तर-पश्चिम भारत में स्थित यह श्रृंखला लगभग 692 किलोमीटर लंबी, जो गुजरात के पालनपुर से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा से गुजरते हुए दिल्ली तक फैली हुई ।
---भौगोलिक महत्व के हिसाब से यह मरुस्थल के प्रसार को रोकने में एक सहायक प्राकृतिक अवरोधक है।इस तरह भौगोलिक दृष्टि से यह पर्वतमाला उत्तर भारतीय मैदानों को थार मरुस्थल से अलग करती है। यह बनास, साबरमती और लूनी जैसी महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम स्थल भी है। वनस्पतियाँ और जीव-जंतु जैव विविधता का समृद्ध संसार रचते हैं। यह पर्वतमाला वर्षा जल को संचित कर भूजल स्तर बनाए रखने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।आर्थिक और पर्यावरणीय दृष्टि से यह क्षेत्र जैव विविधता का केंद्र है।
---इतिहास के पन्नों में अरावली वीरता और संघर्ष की साक्षी रही है। इसी के आँचल में मेवाड़, मारवाड़ और अंबाजी जैसी सभ्यताएँ पली-बढ़ीं। हल्दीघाटी का रणक्षेत्र, जहाँ महाराणा प्रताप ने स्वाभिमान की अमिट गाथा लिखी, अरावली की गोद में गूंजित है। यहाँ गुफाएँ, किले और मंदिर, मानव और प्रकृति के सहअस्तित्व की कहानी कहते हैं।
----हालांकि, वर्तमान में अवैध खनन और शहरीकरण के कारण अरावली के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो रहा है। अरावली हमें प्रकृति का वरदान एवं संस्कृति का श्रृंगार जैसा मिला है।
अरावली समय का साक्षी
खड़ा अडिग जो युग-युग से, अरावली प्राचीन तुंग
रची बसी आदिम पन्नों की... कथा गाथाएं ...
धूसर चट्टानें अशेष गौरवमयी इतिहास कहे!
राणा की हुंकार से गूंजित, चेतक की पगचाप अमर है
हल्दीघाटी का शौर्य अमिट बसा यहां!!
देखो गुरु-शिखर अम्बर को छूता!
हरियाली की ओढ़ी चुनरिया
रत्नगर्भा अरावली..
गौरव से आज धरा पर इतराता!
पर आज हुआ मन व्यथित उसका ..
..अपनों के दिये घावों से !!
जागो जागो भारतवासी ,
आज समय पुकार रहा है अरावली की अस्मिता को,
दो नव-प्राण, दो अधिकार!!
मनीषा आवले चौगांवकर,
दिल्ली

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