राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु
विषय ...मुलाकात - डा अनन्तराम चौबे अनन्त
लगतीं हैं तुम बिन
सूनी ये गलियां ।
सारा सच महकती नहीं हैं
यों बागों से कलियां ।
होली के रंग भी
पड़े आज फीके ।
साथी नहीं जो
तुम्हारे सरीखे ।
वो गांव के पनघट
भी सूने पड़े हैं ।
न दिखते हैं गोरी
के सिर पर घड़े हैं ।
छूटा साथ जब से
सारा सच मुद्दत गुजर गई ।
यादों की परछाई
फीकी सी पढ़ गई ।
होली ही थी जब
मुलाकात हुई थी ।
नजरों से आपस में
जब नजरें मिलीं थी ।
सरमाते सकुचाते
रगों से रंग डाला ।
सारा सच चेहरा दोनों का
बहुत ही था भोला भाला ।
फिर तो मुलाकातें
यों बढती गई थी ।
दिन दूनी और रात
चौगुनी हुई थी ।
समय ने फिर ऐसा
चक्कर चलाया ।
सारा सच मिलना दोनों
का किसी को न भाया ।
तड़पते तरसते
बिछड़ें फिर ऐसे ।
देख भी न पाये
प्यार की नजर से ।
तड़फे और तरसे
यादों में हर पल ।
आंखों की निंदिया हुई
दुश्मन यों पल पल ।
परछाई भी कुछ
कतराने लगी थी ।
अनायास सूरत जब
आइने में जो देखी थी ।
आखिर इस मन को
किसी ने समझाया ।
मुरझाये मन को
यों ढाढस दिलाया ।
बदली समय ने
करवट यों फिर से ।
जब देखा किसी ने
फिर तिरछी नजर से ।
उस चेहरे में दिखती थी
सूरत वही प्यारी ।
किस्मत फिर बदली
खिली दुनिया सारी ।
बातो की मधुरता ने
दिल को तड़पाया ।
किस्मत से दिन भी
वो होली का आया ।
बदल गई किस्मत
फिर प्यारी प्यारी
रंग से भिगो दी
चुनरिया भी प्यारी ।
खिला फिर से चेहरा
जो मुरझा गया था ।
यादों में उनकी
मर सा गया था ।
होली के रंग से
रंगें दिल ये पूरे ।
बिछड़ें थे जैसे
मिले दिल अधूरे ।
जब से उनसे
मुलाकात हुई है ।
किस्मत जैसे
बदल ही गई है ।
महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
जबलपुर म प्र
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