Thursday, 5 March 2026

मुलाकात - डा अनन्तराम चौबे अनन्त

राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी 
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
विषय ...मुलाकात  - डा अनन्तराम चौबे अनन्त 

लगतीं हैं तुम बिन
सूनी ये गलियां ।
सारा सच महकती नहीं हैं
यों बागों से कलियां ।

होली के रंग भी
पड़े आज फीके ।
साथी नहीं  जो
तुम्हारे सरीखे ।

वो गांव के पनघट 
भी सूने पड़े हैं ।
न दिखते हैं गोरी 
के सिर पर घड़े हैं ।

छूटा साथ जब से
सारा सच मुद्दत गुजर गई ।
यादों की परछाई
फीकी सी पढ़ गई ।

होली ही थी जब
मुलाकात हुई थी ।
नजरों से आपस में
जब नजरें मिलीं थी ।

सरमाते सकुचाते
रगों से रंग डाला ।
सारा सच चेहरा दोनों का
बहुत ही था भोला भाला ।

फिर तो मुलाकातें
यों बढती गई थी ।
दिन दूनी और रात
चौगुनी हुई थी ।

समय ने फिर ऐसा
चक्कर चलाया ।
सारा सच मिलना दोनों 
का किसी को न भाया ।

तड़पते तरसते
बिछड़ें फिर ऐसे ।
देख भी न पाये
प्यार की नजर से ।

 तड़फे और तरसे
 यादों में हर पल ।
आंखों की निंदिया हुई
दुश्मन यों पल पल ।

परछाई भी कुछ
कतराने लगी थी ।
अनायास सूरत जब
आइने में जो देखी थी ।

आखिर इस मन को
किसी ने समझाया ।
मुरझाये मन को
यों ढाढस दिलाया  ।

बदली समय ने
करवट यों फिर से ।
जब देखा किसी ने
फिर तिरछी नजर से ।

उस चेहरे में दिखती थी
सूरत वही प्यारी  ।
किस्मत फिर बदली
खिली दुनिया सारी ।

बातो की मधुरता ने
दिल को तड़पाया ।
किस्मत से दिन भी 
वो होली का आया ।

बदल गई किस्मत
फिर प्यारी प्यारी
रंग से भिगो दी
चुनरिया भी प्यारी ।

खिला फिर से चेहरा
जो मुरझा गया था ।
यादों में उनकी
मर सा गया था  ।

होली के रंग से
रंगें दिल ये पूरे ।
बिछड़ें थे जैसे
मिले दिल अधूरे ।

जब से उनसे 
मुलाकात हुई है ।
किस्मत जैसे 
बदल ही गई है ।

 महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
  जबलपुर म प्र

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