Wednesday, 15 July 2026

दान - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

 

दान - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

'देने की क्रिया', दान कहलाता है।
नियमित रूप से दान देना, 
हमें यही बताया जाता है।
तुलसी दास जी ने कहा,
'दान दिये धन ना घटे, जो सहाय रघुबीर।'
दानी मनुष्य के नैनों में, आता कभी न नीर।
दान, भोग और नाश, 
धन की हैं तीन गतियांँ।
दान सबसे उत्तम है, जानती है दुनिया।
दान करना सिखलाता है,
हमारा संस्कार।
इलाज में मदद करो, 
है कोई अगर बीमार।
किसी जरूरतमंद की सहायता करो, पोंछो उसके अश्क।
इतने आगे तुम बढ़ोगे, 
लोग करेंगे तुमसे रश्क।
कहते हैं दाएं हाथ से दान दो तो बायें को पता न चले।
दान करने वाले को, 
कभी न कोई कमी खले।
अंगदान का क्या कहना, 
किसी का जीवन, खुशियों से भर जाता।
आपके जाने के बाद भी, आपका अंग किसी के काम आता।
वीर योद्धा थें कर्ण, मित्रता निभाये।
कवच और कुंडल सहर्ष दे दिया,
दानवीर कहलाये।
अन्नदान करना,  हमें बताया जाता।
दान करने वालों का, 
दोनों लोक संवर जाता।
गोदान का महत्व, हमारे पुराणों में बताया गया है। 
किसी के प्राणों को बचाना, अभय दान कहा गया है।
राजा शिवि ने कबूतर को, अभयदान दिया।
शरणागत को बचाने के लिए, बाज के सामने खुद को पेश किया।
तीन पग भूमि माँगी राजा बलि से प्रभु ने, दान स्वरूप।
सहर्ष तैयार हो गए राजा बलि, नीति के अनुरूप।
एक पग से धरती मापी, दूसरे पग से अंबर।
तीसरी पग हेतु राजा बलि सिर झुकाए, जोड़े  दोनों कर।
खुश हुए प्रभु, चिरंजीवी होने का आशीर्वाद राजा बलि पायें।
द्वारा से कोई खाली हाथ न लौटे, राजा बलि हमें यही बतलाएं।
पुस्तक का दान दें, कई लोग होंगे लाभान्वित।
उम्मीद कभी मत छोड़ें, रहें सदा आशान्वित।
दान सदा सुपात्र को देना चाहिए।
दान देने के लिए, औरों को भी प्रेरित करना चाहिए।
बचपन से ही बच्चे को, दान का महत्व बताएँ।
छोटे-छोटे दान ही सही, उनके हाथों से करवाएंँ।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
स्वरचित
वेस्ट बंगाल 

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