मुलाकात - कवयित्री राजवाला पुंढीर
हुई मुलाकात तुमसे जिस पल में सनम
कोसती मै उस पलको अब दिन रात हूँ।
बड़ी खुराफात तुमने की मेरे सनम
पर तुम्हारे लिए मैं अब तम रात हूँ।
क्यों अँखियाँ ये मेंरी धोखा खा गई
क्यों बतियां तुम्हारी मुझको भा गईं
पूंछती मैं इस दिल से वस यही बात हूँ।
ये मुलाकात ऐसी नागिन बन गई
नहीं मालूम पड़ा ये आ कब डस गई
है ये जहरीला तन मन विष बरसात हूँ।
शोषण होता रहा ही, हम सहते रहे
मुझको ना हीं सताओ ये कहते रहे
वो उगलते हैं आग तो मैं हिमपात हूँ।
क्या थे जीवन नज़ारे अब क्या होगये
जो थे जुगनू सितारे अब कहां खोगये?
पूंछती रोज जग से तो यही बात हूँ।
किसका रहता है दोष,ना आया समझ
इतने सालों से हृदय था ये ना समझ
फिर भी कहते हैं सब मैं चालाक हूँ।
टूटी कश्ती है मेरी कब किनारा मिले?
यात्रा लंबी है माझी भी कैसा मिले?
माँ के चरणों में करती रो अरदास हूँ।
साहस देती रही माँ ,पंख लगते रहे
भूलें होती रहीं मां पग पड़ते रहे
मुझे लगता है कभी कि मैं जांबाज हूँ।
करे साजिश गर प्रेमी हर एक बात में
आग लग जाए तो ऐसी मुलाकात में
कभी पूरे ना हों वो मैं जज्बात हूँ।
सिसकियाँ ही तो मेरी सदा साथी थीं
लोरियां भी वो मेरे लिए ही गाती थीं
स्वप्न में भी रोती हुई मैं हर रात हूँ।
कहती पुंढीर छलिया ये जग होगया
जग की देखी है हुलिया ये दिल रोगया
नैनो के आँसुओं की मैं बरसात हूँ।
कवयित्री राजवाला पुंढीर
एटा उत्तरप्रदेश

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