Monday, 9 March 2026

धोखा - राजवाला पुंढीर

धोखा - राजवाला पुंढीर

प्रेम होता है क्यों इस कदर देखिए
प्रेम ही प्रेम में वो बलि चढ़ गये
धोखे मिलते हैं क्यों प्रेम में देखिये
इश्क ही इश्क में रज बन उड़ गये।

प्यार के होते हैं चर्चे हर गली
तब तो मन की दीखे खिलती हर कली 
यारो मोहब्बत के इन परिंदों देखिये
मुरझाते हुए कब गगन उड़ गये।

यार के प्यार में खाए धोखे बहुत
प्यार के भाव में आये टोटे बहुत
कितने गिरते हैं दर हाट में देखिये?
आज अम्बर दिखे कल धरन गढ़ गये।

दिल्लगी में मिलीं हमको चोटें बहुत
बन्दिगी में मिलीं हमको रोकें बहुत
प्रेमी दिलबर बना या ईश्वर देखिये
घाव कदमों में फिर भी पग बढ़ गये।

बीतते पल गए जिंदगी भी बढ़ गयी 
त्याग की मूर्ति भी आगे बढ़ गयी
यार  मिलता है क्या त्याग में देखिये?
आज इसके भी दर हाट में बढ़ गये।

प्रेम मीरा का था प्रेम सीता का था
न कम मीरा का था,न कम सीता का था
पड़ी देनी परीक्षा प्रेम में देखिये
एक अग्नि जली,दूजी मुख विष चढ़गये।

कवयित्री
राजवाला पुंढीर 
एटा, उत्तरप्रदेश 

फंस जाते हैं हम जब जंजाल में 
तब चाहें निकलना हर हाल में
आ जाते हैं बीच तब ऐसे भेड़िए
मांस नुचवाने को पग आगे बढ़ गये।

देते धोखा पर धोखा थकते नहीं
पकड़े जाते हैं झूंठ पर बकते नहीं
कितने होते हैं ढीठ आप सब देखिये
धोखा देते देते ही वो ऊपर गये।

कहती पुंढीर है मन भी अधीर है
इसके लिखते हुए नैनों में नीर है
कितना गिरता गया है शख्स देखिये
पाप नदियों के यहां सैलाब बढ़ गये।

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