स्त्री - संजय वर्मा "दृष्टि
सच में अगर हम कविता रचतेस्त्री पर रचेवो प्रकृति का साक्षात् रूप होतीकविता और स्त्री दोनों ही सृजन करतीऔर दोनों के बिना तोयह धरती बंजर होने में देर नहीं लगती Iकविता और स्त्रीजगह पर तमाम मोहक रूपों में दिखतीऔर हम अभिभूत होते जातेजीवन चक्र की भाति ।सुना था पहाड़ भी गिरतेस्त्री पर पहाड़ गिरना समझ आया।कुछ समय बाद पेड़ पर पुष्प हुए पल्ल्वितजिन्हें बालों में लगाती थी कभीवो बेचारे गिर कर कहरा रहे और मानोकह रहे उन लोगो से जोशुभ कामों में तुम्हे धकेलते पीछेस्त्री का अधिकार न छीनोबिन प्रकृति और स्त्री के बिना संसार अधूराहवा फूलों की सुगंध के साथगिरे हुए पुष्प का कर रही सृजन के साथ समर्थन ।
संजय वर्मा "दृष्टि "125 बलिदानी भगतसिंहमार्गमनावर जिला -

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