Thursday, 12 March 2026

स्त्री - संजय वर्मा "दृष्टि

 स्त्री - संजय वर्मा "दृष्टि
सच में अगर हम कविता रचते
स्त्री पर रचे
वो प्रकृति का साक्षात् रूप होती
कविता और स्त्री दोनों ही सृजन करती 
और दोनों के बिना तो
यह धरती बंजर होने में देर नहीं लगती I
कविता और स्त्री 
जगह पर तमाम मोहक रूपों में दिखती
और हम अभिभूत होते जाते
जीवन चक्र की भाति ।

सुना था पहाड़ भी गिरते
स्त्री पर पहाड़ गिरना समझ आया।
कुछ समय बाद पेड़ पर पुष्प हुए पल्ल्वित 
जिन्हें बालों में लगाती थी कभी 
वो बेचारे गिर कर कहरा रहे और मानो 
कह रहे उन लोगो से जो 
शुभ कामों में तुम्हे धकेलते पीछे 
स्त्री का अधिकार न छीनो 
बिन प्रकृति और स्त्री के बिना संसार अधूरा 
हवा फूलों की सुगंध के साथ 
गिरे हुए पुष्प का कर रही सृजन के साथ समर्थन ।

संजय वर्मा "दृष्टि "
125 बलिदानी भगतसिंहमार्ग 
मनावर जिला -

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