गाथा - ख़ुशी झा
जय विजय क़ी बात नहीं
बस शत्रु का संहार हो
नारियों में युद्ध क़ी ललकार हो
भावना के परे स्त्रित्व अवतार हो.
किसी एक क़ी बात नहीं,
विश्व विजय परमार हो,
लड़ सके जो मिट सके जो
ऐसी चेतना का अवतार हो
नीलम्ब उठे भड़क उठे,
जो एक भी अगर वार हो.
जय विजय क़ी बात नहीं,
आत्मबल हीं परमार्थ हो.
कभी रुके नहीं कभी झुके नहीं
ऐसी अपनी सेना का साथ हो,
बचा कर लहू साथियों के
शत्रुओं का हीं विनाश हो,
है अक्षम अजय वीर योद्धा
देखना अब कोई ना वार हो.
चीर दे जो दुश्मन क़ी भुजा क़ो
ऐसा हर एक नरसिंह अवतार हो
शेष बस बचाना नव जीवन रहे,
हर वार दुश्मनों का बेकार हो.
है हिन्द क़ी सेना सदा हीं विजयी
सैन्य भारतीय पर हमें तो है नाज़
है हर मुश्किलों में साथ साथ खड़े,
तो कैसे ना मिले हमको तख़्तताज़.
है ज़िद यही अपना हर सपना साकार हो,
हिंदुस्तान क़ी धरती पर हमारा अधिकार हो,
चीर कर ऱख दें हम भारतीय उन भुजाओं क़ो
जो करता हमें कोई टकराव का ललकार हो.
ख़ुशी झा
मुंबई

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