Tuesday, 21 April 2026

ज़मीर बेच रहे हैं - रशीद अकेला

ज़मीर बेच रहे हैं - रशीद अकेला 

ज़मीर बेच रहे हैं ईमान बेच रहे हैं*

तीर बेच रहे हैं लोग नफ़रत के कमान बेच रहे हैं 
सच है के लोग ज़मीर बेच रहे हैं ईमान बेच रहे हैं 

लाशों पे बेगुनाहों के जाके देखा मैंने 
मौत बेच रहे हैं मौत का सामान बेच रहे हैं 

इंसानियत के पैरोकार कहाँ हैं जहां में 
नफ़रत वाला हिंदू देख रहे हैं मुसलमान देख  रहे हैं 

ज़ुल्म करने से ख़ामोश देखने वाला वाला है बड़ा मुजरिम 
लोग तो बस अपना नफ़ा और नुक़सान देख रहे हैं 

सड़कों पे होते है तमाशे रोज़ उठते हैं इज़्ज़त के जनाज़े रोज़ 
रोज़ मरती इंसानियत मरता इंसान देख रहे हैं 

वतन को अपने संभल रखा है निः स्वार्थ मगर रशीद 
रोज़ खेतों किसान और सरहदों में मरता जवान देख  रहे हैं

रशीद अकेला ,झारखंड 
लेखक एवं समाजसेवी

No comments:

Post a Comment