Thursday, 9 April 2026

ज्ञानदीप से डिजिटल ज्योति तक - डॉ. वै. कस्तूरी बाई

 ज्ञानदीप से डिजिटल ज्योति तक - डॉ. वै. कस्तूरी बाई 


गुरु की वाणी में बसता है जीवन का सच्चा प्रकाश,
शिक्षक बनकर जो दिखाता अज्ञान में भी विश्वास।
शिष्य जब श्रद्धा से झुकता, मन हो निर्मल, निष्काम,
विद्यार्थी बन सीखता रहता, हर दिन नया आयाम।

चेला बनकर अपनाता जो गुरु के पावन विचार,
गुरुदेव की कृपा से मिलता, सत्य का अमृत अपार।
महात्मा की तपस्या गहरी, जैसे सागर की थाह,
दीक्षा लेकर बदल जाता जीवन का हर एक प्रवाह।

आचार्य की दृष्टि में छुपा ज्ञान का अनंत विस्तार,
आशीर्वाद से खिल उठता सूखा मन भी हर बार।
महाराज के चरणों में है विनम्रता का सच्चा धन,
भक्त बनकर जो समर्पित, पा ले जीवन का कारण।

तपस्या की अग्नि में तपकर बनता कुंदन इंसान,
गुरु की छाया में मिलता हर प्रश्नों का समाधान।
शिष्य, विद्यार्थी, चेला सब एक ही पथ के राही,
ज्ञानदीप से जगमग होता जीवन की हर इक चाही।

आजकल की पीढ़ी दौड़ती डिजिटल जग के संग,
ए आई और नई विधाओं में खोजे अपना रंग।
पर तकनीक भी सिखाती है, जब मिलता सही मार्गदर्शक,
हर एल्गोरिदम के पीछे होता एक गुरु का ही स्पर्श।

चाहे युग बदले, साधन बदलें, बदले हर एक आकार,
गुरु बिना अधूरा रहता हर ज्ञान और हर विचार।
डिजिटल हो या आध्यात्मिक, सत्य यही हर बार—
गुरु ही बनाता मानव को सच में आत्मसाकार।

डॉ. वै. कस्तूरी बाई 
बेंगलुरु कर्नाटक 

No comments:

Post a Comment