आमार सोनार बांग्ला - विदुषी प्रज्ञा
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"* जहां सुबह की प्रथम किरण *गंगा* की लहरों को चूमती है ,
जहां *हरियाली* की चुनर ओढ़े धरती मदहोश हो झूमती है ,
*पलाश* के लाल रंगों से जहां सिंदूरी हर शाम है ,
वह *ज्ञान* और *आध्यात्म* का पावन *पश्चिम बंगाल* है ।
*बाउल* के इक तारे की धुन जहां हर रुह को छू जाती है ,
*पद्मा* की ठंडी लहरें मन की तृष्णा मिटाती है ,
दूर्गा पूजा के *ढाक की थाप* यहां, जब हवाओं में घुल जाती है ,
*शक्ति* और *भक्ति* के रंग से हर गली रंग जाती है ,
*हुगली* के उस पुल पर देखो जहां प्राचीन इतिहास खड़ा मुस्काता है,
*कोलकाता* का हर कोना हर दिन नई कहानी सुनाता है ,
*टैगोर* की लेखनी यहां और दाने-दाने में बसती मिठास है ,
रसगुल्ले की चाशनी-सा मीठा रिश्तों का अहसास है ,
*विवेकानंद जी* का ओज यहां , और *सुभाष बोस* की ललकार है ,
*क्रांति* और *शक्ति* का अद्भुत मिलता यहां विस्तार है ,
*सोनार बांग्ला* की यह माटी कला का एक वरदान है ,
सारे जग में सबसे न्यारा मेरा *हिंदुस्तान* महान है ....!!
*"जहां ज्ञान का उद्गम और क्रांति की ज्वाला है....
वह विश्व वंदनीय शस्य श्यामला *"आमार सोनार बांग्ला हैं "*
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नाम- लेखिका विदुषी प्रज्ञा

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