संबंध - कवयित्री राजवाला पुंढीर
आज संबंध की हम चर्चा क्या करें
हाल लिखने में हमको शर्म आती है
देख कर रूह रोती हमारी प्रभु
आज नफ़रत ही हमको नजर आती है।
जहां पैसा दिखे वहां पै जाते है लोग
यहां पैसों का ही तो लगा सबको रोग
यहां पै रिश्तों से ज्यादा पैसा है बड़ा
आज इज्जत पैसों से नजर आती है।
संबंधों की दुनियां निराली हो गई
नातों की बगिया सवाली हो गई
यहां के संबंध हमको अब भाते नहीं
यहां पै स्वार्थ भरी बदबू आती है।
भाई हंसता खड़ा बहन लाचार है
भाई रोता पड़ा बहन का वार है
कहीं भाई बेरहम कहीं बहन बेरहम
प्यार की हर लड़ी भी कुतर जाती है।
जब संतान होगी यहां कलयुगी
तो माता पिता भी हुए कलयुगी
जब होती गरीबी बेटा बेटी पै
तो उनकी नजर भी बदल जाती है।
कोई जग में किसी का रहा ही नहीं
कोई माने किसी का कहा ही नहीं
फैसला खुद ही लेते हैं हर बात का
बात संभली हुई भी बिगड़ जाती है।
कभी अपने पराए यहां हो जाते है
कभी दुख दर्द में न वो मुंह छुपाते है
दूरियां बढ़ रहीं हैं कहीं अपनों से
तो गैरों से कहीं प्रीत बढ़ जाती है।
जब दुत्कार देते है अपने ही लोग
तब बढ़ बहुत जाता है हृदय का रोग
सूख जाते हैं आंसू न भीगें पलक
हर लड़ी टूट कर फिर बिखर जाती है।
लिखती पुंढीर है इसकी अंखियां हैं नम
क्यों अपने ही अपनों को देते हैं गम
कागज पर कलम भी रोकर चले
अश्रु धारा कागज पै बिखर जाती है।
कवयित्री राजवाला पुंढीर
एटा, उत्तरप्रदेश

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