अरावली ना खो देना - गणपत लाल उदय
विधा - कविता
मुझे बचाओ मुझे बचाओ कोई हमारी आवाज़ सुनो,
भविष्य-बचाओ अपना व मेरा नहीं कोई जाल बुनो।
जीवन की रेखा कहलाती हूं मुझको न आघात करो,
असर इसका भयावक होगा सुनलो आज सब जनो।
बिलख रही आज टूट रही सब को जीवन देने वाली,
न कोख उजाड़ो हत्यारों में सबको सुरक्षा देने वाली।
कैसे बचाऊं में जल जंगल, जीव जानवर, हरियाली,
आवाज़ बनों न ख़ामोश रहो मैं हूं रक्षक नही काली।
इस दुनिया की पर्वत-श्रृंखला में एक मैं ही जिन्दा हूं,
इतिहास में रह जाऊंगी जो आज ऊंची यह चोटी हूं।
अभी भी वक्त है बचालो मुझको मैं जिंदा वरदान हूं,
फिर स्वास्थ्य वायु प्रदूषण महामारियों का सैलाब हूं।
भारी पड़ेगा प्रत्येक जीव को मुझसे छेड़छाड़ करना,
जंगल उजाड़कर जल संकट, धूलभरी आंधी सहना।
करोड़ों वर्षो से देती रही में कभी किसी से ना लिया,
समय व साम्राज्य बदला मैं ना बदली भाईयों बहना।
लिखो लेख, आलेख, कविता अरावली को खो देना,
लिखना मेरे गुण-अवगुण दिया लिया सभी लिखना।
लिखना भक्षक कौन थें मेरे ये भूख लगी चबा लिया,
दर्दनाक अध्याय है लेकिन सत्य बात ज़रुर लिखना।
सारा सच लिखा है हमनें अरावली पर्वतमाला ऊपर,
तकलीफ़ ना पाए गांव-शहर ध्यान रहे इस बात पर।
थोड़ी चिन्ता व मनन करों सोचना पड़े चाहें रात-भर,
निर्णय ले लो फिर से भले प्रभावशाली इस बात पर।
सैनिक की कलम से
गणपत लाल उदय
राजस्थान

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