Friday, 8 May 2026

मजदूर - डा अनन्तराम चौबे अनन्त

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी 
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
मजदूर  - डा अनन्तराम चौबे अनन्त

पैदाइशी कोई मजदूर नही 
काम से मजदूर बना देते हैं ।
उनके मन में ये भावना 
भरकर मजदूर बना देते है  ।

फर्क सिर्फ इतना रहता है
मेहनत करके काम करते हैं ।
जहां भी काम मिल जाता है
उस घर में मजदूरी करते हैं ।

मजदूर से अधिक मेहनत 
किसान हमेशा करता है ।
खेतों में मिट्टी से हमेशा 
हर मौसम में जुड़ा रहता है।

सारा सच मजदूर से 
ज्यादा मेहनत  करता है ।
समय का कोई बंधन 
नही मजदूरी करता है ।

सुबह पांच वजे से
फसलों को पानी देता है ।
देर रात नौ दस वजे तक
खेतों में काम करता है ।

सारा सच मिट्टी में 
बैठकर खाना खाता है ।
नींद आ जाये तो
मिट्टी में सो जाता है ।

दाल रोटी खाकर ही
अपना पेट भर लेता है ।
समय पर जो खाना मिले
वही स्वादिष्ट भोजन होता है ।

मजदूर से भी ज्यादा किसान 
खेतों में मेहनत करता है ।
मजदूर तो फिर भी छांव में
बैठ आराम कर लेता है ।

सारा सच कभी धूप 
कभी छांव में रहता है ।
बस सात आठ घंटे 
ही काम करता है ।

मजदूर और किसान में
थोड़ा सा अन्तर रहता है ।
किसान काम अपने खेत में 
मजदूर कहीं भी काम करता है।

मजदूर को मजदूर का 
ठप्पा  लगा दिया है ।
उसको हीन भावना
से ग्रसित कर दिया है ।

सरकारी या गैर सरकारी 
सभी तो मजदूर होते है ।
अन्तर इतना है बस कुर्सी 
पर बैठकर काम करते है ।

नौकरी जो भी करता है
वो भी तो नौकर होते हैं ।
सरकारी या प्राइवेट हों
सभी नौकर ही होते हैं ।

मजदूर भी अब नही मिलते हैं
सरकार से राशन मुफ्त में लेते हैं ।
कहावत है मुफ्त में मिले खाने को 
तो फिर काहे जाए कमाने को ।

महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त 
 जबलपुर म प्र

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