अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु
मजदूर - डा अनन्तराम चौबे अनन्त
पैदाइशी कोई मजदूर नही
काम से मजदूर बना देते हैं ।
उनके मन में ये भावना
भरकर मजदूर बना देते है ।
फर्क सिर्फ इतना रहता है
मेहनत करके काम करते हैं ।
जहां भी काम मिल जाता है
उस घर में मजदूरी करते हैं ।
मजदूर से अधिक मेहनत
किसान हमेशा करता है ।
खेतों में मिट्टी से हमेशा
हर मौसम में जुड़ा रहता है।
सारा सच मजदूर से
ज्यादा मेहनत करता है ।
समय का कोई बंधन
नही मजदूरी करता है ।
सुबह पांच वजे से
फसलों को पानी देता है ।
देर रात नौ दस वजे तक
खेतों में काम करता है ।
सारा सच मिट्टी में
बैठकर खाना खाता है ।
नींद आ जाये तो
मिट्टी में सो जाता है ।
दाल रोटी खाकर ही
अपना पेट भर लेता है ।
समय पर जो खाना मिले
वही स्वादिष्ट भोजन होता है ।
मजदूर से भी ज्यादा किसान
खेतों में मेहनत करता है ।
मजदूर तो फिर भी छांव में
बैठ आराम कर लेता है ।
सारा सच कभी धूप
कभी छांव में रहता है ।
बस सात आठ घंटे
ही काम करता है ।
मजदूर और किसान में
थोड़ा सा अन्तर रहता है ।
किसान काम अपने खेत में
मजदूर कहीं भी काम करता है।
मजदूर को मजदूर का
ठप्पा लगा दिया है ।
उसको हीन भावना
से ग्रसित कर दिया है ।
सरकारी या गैर सरकारी
सभी तो मजदूर होते है ।
अन्तर इतना है बस कुर्सी
पर बैठकर काम करते है ।
नौकरी जो भी करता है
वो भी तो नौकर होते हैं ।
सरकारी या प्राइवेट हों
सभी नौकर ही होते हैं ।
मजदूर भी अब नही मिलते हैं
सरकार से राशन मुफ्त में लेते हैं ।
कहावत है मुफ्त में मिले खाने को
तो फिर काहे जाए कमाने को ।
महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
जबलपुर म प्र
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