Tuesday, 26 May 2026

हौसलों से उम्मीद - संजय एम. तराणेकर

हौसलों से उम्मीद - संजय एम. तराणेकर

अंधेरों से क्यों डरना है, जब भीतर दीप जला है,
रास्ते चाहे कठिन हों, हौसलों से उन्हें सजाना है।
ये ठोकरें ही सिखाती हैं, कैसे आगे बढ़ जाना है,
गिरकर फिर उठ जाना, ये जीवन का 'तराना' है।

सपनों को मत सोने दो, उन्हें हकीकत बनाना है,
आज नहीं तो कल ही, 'मंजिल' तक तो जाना है।
हवा तेज़ हो या आँधी, दीपक फिर भी जलता है,
जो खुद पर विश्वास रखे, वही सदा 'संभलता' है।

उम्मीद की ये छोटी लौ, अंधेरा सब 'हर' जाती है,
जो कभी हार नहीं माने, वो जीत वरण करता है।
उजालों की ओर जो देखें, वहीं तो 'टिक' पाता है,
ख्वाब और ख्वाहिशे बड़ी, वही प्रेम गीत गाता है।

(स्व-रचित, मौलिक व अप्रकाशित)

संजय एम. तराणेकर,
(कवि, लेखक व समीक्षक)
 (मध्यप्रदेश)

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