Wednesday, 1 July 2026

मेल मिलाप - नेहा बागड़ी

मेल मिलाप - नेहा बागड़ी 
 दो शब्दों का मेल नहीं, बल्कि इंसानियत की सबसे खूबसूरत परिभाषा है। जिसका  अर्थ है दिलों के बीच की दूरी को मिटाना, और गिले-शिकवे भुलाकर नए रिश्ते बनाना। यह वह धागा है जो अलग-अलग रंग, धर्म, भाषा और सोच वाले लोगों को एक माला में पिरो देता है।  
 परिवार के  सदस्यों में अगर यह भाव मौजूद  हो तो छोटी-छोटी बातें बड़ी नहीं बनतीं। तीज-त्योहार पर सबका साथ बैठना, एक-दूसरे की सुनना  यही घर को घर बनाता है।   गाँव में चौपाल, शहर में मोहल्ला समिति, स्कूल में दोस्तों का समूह  ये सब इसी भाव  की छोटी पाठशालाएँ हैं।   भारत जैसे विविधता भरे देश में 140 करोड़ लोग सिर्फ इसी  भावना से ही एक साथ खड़े हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, हर बोली-हर रिवाज को अपनाना ही हमारी असली ताकत  है। वैर-भाव पालने से मन अशांत रहता है। माफ करना, गले लगाना, पुरानी बात भूल जाना बेहतर  है। इससे हम  रिश्तों को टूटने से  बचा सकते  हैं।
 ईद की सेवई हो या दिवाली की मिठाई, जब हम एक-दूसरे के घर जाकर त्योहार मनाते हैं तो ‘अपना-पराया’ का फर्क मिट जाता है।  हमें अपने बच्चों को दूसरों के साथ मिलकर रहना, अच्छा व्यवहार, बड़ों का आदर करना सीखाना चाहिए क्योंकि  ये  बच्चें ही  समाज को जोड़ने का कार्य करेंगे।  
मेल-मिलाप  वो प्रेम का धागा है जो हमारे परिवारों को, समाज को, देश के लोगों को बांध कर रखे हुए है अतः  इसे सँभाल कर रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। आओ, मेल मिलाप को अपना स्वभाव बनाएँ — क्योंकि जुड़ने में ही जीत है।


नेहा बागड़ी 
भिवानी (हरियाणा)

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