त्याग - कमल धमीजा
दिल किसी का कभी, न दुखाया करो।
हो सके तो मरहम तुम, लगाया करो।
त्याग जरूरी है, इंसानियत के लिए-
छोड़ो शिकवे -गिले मुस्कुराया करो।
तृप्ति त्याग में है छुपी, प्राप्ति बढ़ाती प्यास।
तृप्ति भोग में है नही , करता भोग उदास।
पाने की इच्छा सुखद , दुर्लभ की हो चाह-
मिल जाने पर मूल्य कम, घटे हास परिहास।
मेरा वादा है, जल्दी से लौट आऊॅंगा।
अपने वादे पर, कभी न खोट खाऊॅंगा।
त्याग करता हूँ करता रहूॅंगा सारी उमर-
"कमल" दावा है मेरा, कभी न चोट खाऊॅंगा।
स्वरचित मौलिक अधिकार रचना
कमल धमीजा
फरीदाबाद- हरियाणा
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