श्रम नारायण - Dr. Pro. Y. Kasturi Bai
************
श्रम-ज्योति जहाँ प्रज्वलित, वहाँ जगत उजियारा है,
कामगार-श्रमजीवी जन ही जीवन का आधार हमारा है।
“उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी”— वाणी यह अमर,
परिश्रम-रथ पर आरूढ़ जन, रचते इतिहास प्रखर।
कारीगर के कर-कौशल से रूप धरे निर्जीव पाषाण,
मज़दूर के श्रम-सिंचन से हँसता हर सूना मैदान।
बेलदार की धरती-गंध में जीवन का मधुर विस्तार,
निर्माणकर्मी के स्वेद-बिंदु रचते नव-संसार अपार।
“मेहनत का फल मीठा होता”— लोकोक्ति सत्य महान,
कर्मपथ पर अडिग चलें तो मिलती निश्चित पहचान।
श्रम करता हर मानव यहाँ जीवन-यज्ञ सजाता है,
उद्यमी बन स्वप्न सँजोकर नव-क्षितिज को पाता है।
कर्मी के कर्तव्य-निष्ठ चरण धरती को धन्य बनाते,
धैर्य-दीप से अंधकार के बादल दूर हटाते।
“जहाँ चाह वहाँ राह”— यह मंत्र उनका संबल है,
असंभव को संभव कर देना उनका दृढ़ संकल्प अचल है।
श्रम ही शिव, श्रम ही सुंदर, श्रम ही जीवन-धारा,
इसके बिना न चले जगत का कोई भी व्यवहार सारा।
अतः वंदन उन कर-कमलों को जो रचते नव-इतिहास,
श्रमवीरों की गाथा गूँजे— युग-युग तक रहे प्रकाश॥
डॉ. प्रो. वै. कस्तूरी बाई
अल अमीन डिग्री कॉलेज
बेंगलुरु
कर्नाटक
Dr. Pro. Y. Kasturi Bai
Bengaluru
Karnataka

No comments:
Post a Comment