दीमक लगे सपने - डॉ अनुपमा वर्मा 'हेमा '
दीमक लग गई सपनों में,
खोखले हो गए अरमान,
डिग्रियों के ऊँचे पर्वत पर,
बैठा है बेरोज़गार इंसान।
कॉकरोच-सी जिद लिए फिरता,
अंधेरों में ढूँढ़े उजियारा,
दर-दर ठोकर खाता युवा,
पूछे किस्मत से अपना गुज़ारा।
मगरमच्छ के आँसू बहते,
मंचों पर भाषण देने वाले,
रोटी, रोजगार, शिक्षा की बातें,
पर वादे निकले खोखले छाले।
आलस का कीड़ा भी कुछ कम नहीं,
युवाओं को भरमाता है,
मेहनत की राह छोड़कर जो,
सपनों को ही खा जाता है।
दीमक केवल लकड़ी में नहीं,
सोच में भी घर कर जाती है,
जब संघर्ष से मुँह मोड़ युवा,
किस्मत को दोष लगाती है।
उठो जवानो! समय पुकारे,
तोड़ो जड़ता की हर दीवार,
मेहनत, साहस और संकल्प से,
बदलो अपना यह संसार।
कॉकरोच, दीमक, कीड़े-मकोड़े,
जीवन का सच समझाते हैं,
खोखलेपन से बचकर चलो,
कर्म ही मंज़िल तक ले जातेहैं।
डॉ अनुपमा वर्मा 'हेमा '
पंजाब

No comments:
Post a Comment