युवा! जागो, राष्ट्र पुकार रहा है - डॉ प्रो वाई कस्तूरी बाई
दीमक बनकर भ्रष्टाचार जब व्यवस्था को खाता है,
काक्रोच-सा अंधेरों में पलता स्वार्थ मुस्काता है।
खोखला होता जाता तब संस्कृति का मजबूत आधार,
कीड़ा बनकर लालच कुतरता जन-जन का अधिकार।
मगरमच्छ के आँसू लेकर कुछ चेहरे मंच सजाते हैं,
सेवा के मधुर वचनों से केवल स्वार्थ कमाते हैं।
बेरोज़गार युवा की आँखों में सपनों का संसार है,
किन्तु दिशाहीन प्रयासों से जीवन भी लाचार है।
आलसी बनकर बैठ रहेगा तो भविष्य अंधकार होगा,
परिश्रम, ज्ञान और साहस से ही स्वर्णिम उद्गार होगा।
देश नहीं केवल भूखंडों का नक्शा या सरकार है,
हर नागरिक के कर्मों से ही इसका श्रृंगार है।
यदि युवा ही समय गँवाकर मोह-निद्रा में सो जाएगा,
तो आने वाला कल भी प्रश्नों में ही खो जाएगा।
उठो युवा! अपने भीतर के पुरुषार्थ को पहचानो,
कर्तव्य-पथ के कठिन शिलाखंडों को भी वरदान मानो।
ज्ञान तुम्हारा शस्त्र बने, चरित्र तुम्हारी ढाल बने,
राष्ट्रहित का पावन संकल्प जीवन का प्रतिपाल बने।
नहीं चाहिए मगरमच्छी वादे, नहीं खोखले उद्घोष यहाँ,
चाहिए कर्म की ज्योति, सत्य का दृढ़ संतोष यहाँ।
दीमक, कीड़े, काक्रोचों से ग्रस्त न हो यह राष्ट्र महान,
युवाशक्ति के जागरण से फिर गूँजे भारत का गान।
आज का श्रम ही कल की समृद्धि का आधार बनेगा,
जागृत, सजग, कर्मठ युवा ही भारत का भविष्य लिखेगा।
विचारणीय यह समय खड़ा है, शोचनीय यह मौन न हो,
युवा जागे, राष्ट्र जागे—भारत फिर से गौरवमय हो।
डॉ प्रो वै कस्तूरी बाई
बेंगलुरु
कर्नाटक

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